<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829</id><updated>2012-02-16T11:28:08.553-08:00</updated><title type='text'>शंकर सोनाने</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>32</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-827635263932287849</id><published>2012-01-28T03:31:00.000-08:00</published><updated>2012-01-28T03:33:41.781-08:00</updated><title type='text'>पिलोरिया--कहानी --कृष्णशंकर सोनाने</title><content type='html'>पिलोरिया&lt;br /&gt;                         &lt;br /&gt;  ‘‘ तुम जिनके लिए प्रज्यापत्य जैसा कठिन व्रत कर रहे हो वो कभी भी तुम्हारे लिए चिन्तित नहीं होती होगी । मेरा कहना मानो तो प्रज्यापत्य व्रत का समापन करा दो ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ नहीं मित्र , हम कदाचित प्रज्यापत्य व्रत को भंग नहीं करेंगे । एक बार किया गया व्रत भंग करना अनुचित तो है ही साथ में अपराध भी है ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ किन्तु मित्र , हम जानते है कि तुम्हारी ‘‘वो‘‘ तुम्हें स्वीकार नहीं करेगी।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ हाँ,जानता हूँ लेकिन हमारी महत्वाकांक्षा केवल उनके सान्निध्य  की है। उनके निकट रहने से हमें आभास होता है कि मानो पीडि़त हृदय पर उनके कोमल स्पर्श का मखमली मरहम लग गया हो ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘कदाचित मित्र, तुम उस पाषाण-हृदय को पहचान जाते ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ तुम्हें मेरे उनके प्रति पाषाण-हृदय कहना उचित नहीं है मित्र ! मेरे ‘‘वे‘‘पाषाण-हृदय नहीं है अपितु वे अज्ञानी है और भीरू भी । संभवतः तुमने मेरे ‘‘उनको‘‘ अभी तक जाना नहीं है।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ क्षमा करें मित्र ! लेकिन तुम्हारे ‘‘वो‘‘ क्या नाम है उनका ?‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ पीएल ,बस, इतना ही समझ लो ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ हाँ, पीएल ही सही लेकिन वे तुमसे पे्रम नहीं करती ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ जानता हूँ मित्र ,हमारी पीएल हमसे पे्रम नहीं करती किन्तु उनके प्रति हमारी आसक्ति,आकर्षण और समर्पण आखिर यह सब.......‘‘&lt;br /&gt;अविनाश की आँखों में अनायास आँसू भर आये । कण्ठ भर जाने से अविनाश आँसुओं को रोक नहीं पाये । अविनाश ,ब्रह्मस्वरूप के कांधों पर सिर रखकर फूट-फूटकर रो पड़े।&lt;br /&gt;  दो वर्ष पूर्व अविनाश अपने निजी आवास के सिलसिले में कल्पतरू अपार्टमेन्ट देखने के लिए अपने मित्र ब्रह्मस्वरूप के साथ गर्मियों के दिनों में गये थे । कल्पतरू अपार्टमेन्ट के  व्दितीय तल पर जिस गृह को देखना था ,ठीक उसी के ठीक सामने पीएल रहा करती थी । संयोगवश उन दोनों ने पीएल के घर ही जाकर सम्पर्क किया था । कहते है कि विधि का विधान ही निराला होता है । कौन जातना था कि अविनाश,पीएल के प्रति मोहित हो जाएंगे और अपने तन मन की सुधि खो बैठेंगे । पहली ही मुलाकात में अविनाश, पीएल को निर्निमेष देखते रह गए थे । मानो पीएल को युगों-युगों से जानते हो । जैसे युगो-युगों से अविनाश को पीएल की तलाश थी और वह आज  अविनाश के सामने साक्षात उपस्थित थी ।&lt;br /&gt;  ‘‘क्या देख रहे हैं आप ?‘‘&lt;br /&gt;इस प्रश्न का उत्तर अविनाश के पास नहीं था फिर भी उसने साहस किया ।&lt;br /&gt;  ‘‘ मुझे लगता है आपको बहुत पहले से जानता हूँ लेकिन कैसे ,मुझे ज्ञात नहीं ।‘‘&lt;br /&gt;पीएल सिर्फ मुस्करा दी । अविनाश को पीएल के मुस्कराने से लगा जैसे सावन के महिने में फूलों की सुखसद बरसात हो आई हो ।&lt;br /&gt;  ‘‘ अच्छा जी ! जाने की आज्ञा दीजिए । नमस्ते !!‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ नमस्ते ! फिर कभी आइयेगा ।‘‘&lt;br /&gt;पीएल करबद्ध हो मुस्करा दी । मोटरसाइकिल पर सवार होते समय ब्रह्मस्वरूप विस्मित थे कि आज अविनाश इतने प्रसन्न क्यो है ? ब्रह्मस्वरूप,अविनाश की मनोभावनाओं को समझने का प्रयास कर रहे थे ।&lt;br /&gt;  ‘‘ बीएस ! जानते हो इस सुन्दरी को मैं कब से जानता हूँ ?‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘युगों-युगों से , है न !‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ तुम कटाक्ष कर रहे हो लेकिन यह अटल सत्य है कि मैं उनको युगों से जानता हूँ । संभवतः अब तक मुझे इनकी ही तलाश थी । एक बात कहूँ ?‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ कहिए ।‘‘&lt;br /&gt;ब्रह्मस्वरूप को अविनाश बीएस कहा करते थे । क्योंकि ब्रह्मस्वरूप बहुत ही अटपटा नाम लगता था । बीएस का प्रश्न सपाट था किन्तु अविनाश के हृदय में आनन्द की हिलोर उठ रही थी ।&lt;br /&gt;  ‘‘ अब हमारी हार्दिक अभिलाषा है कि हम इनके निकट आकर अपना सम्पूर्ण जीवन इनके आंचल में व्यतीत कर दें ।‘‘&lt;br /&gt;और अविनाश ने ऐसा ही किया । जिस किसी तरह से कल्पतरू अपार्टमेन्टस में ठीक पीएल के गृह के सामने अपने लिए एक गृह आवंटित करवा लिया ।&lt;br /&gt;  समय व्यतीत होते पता नहीं लगा । आहिस्ता-आहिस्ता अविनाश अपने हृदय में युगों से छिपी अभिलाषाओं को पीएल पर निछावर करने लगे लेकिन अविनाश ने पीएल पर अपने हृदय में लुके-छिपे प्रेम को उजागर नहीं होने दिया । अविनाश को भय था कि पीएल के समक्ष हृदय की भावनाओं को उजागर कर देने से पीएल का सान्निध्य विछिन्न हो जायेगा । समय के साथ-साथ अविनाश, पीएल के बहुत निकट पहुँच गए।&lt;br /&gt;  ‘‘ आप मेरा इतना अधिक खयाल क्यों रखते हो अविनाश ?‘‘&lt;br /&gt;पीएल ने एक दिन अनायास अविनाश से प्रश्न कर ही लिया । अविनाश चुप रहे । वे मन ही मन सोचने लगे,यदि पीएल के समक्ष हृदय के उदगार प्रगट कर दिए तो भय है कि पीएल इन कोमल रिश्तों को दुत्कार दें । वे संक्षिप्त सा उत्तर देकर रह गए-&lt;br /&gt;  ‘‘ मुझे आपकी सेवा करना अच्छा लगता है । मेरा अपना है ही कौन जिनकी सेवा कर मैं अपने हृदय का भार कम कर सकूँ ।‘‘&lt;br /&gt;अविनाश के उत्तर से पीएल के चेहरे पर प्रसन्नता की रेखाएं उभर आई । वे धन्य धन्य हो गए कि पीएल उनकी सेवा से प्रसन्न है ।&lt;br /&gt;  जिस पे्रम में सेवा भावना,समर्पण की अटूट अभिलाषा और त्याग का पुट सम्मिलित होता है, वह पे्रम वास्तव में ईश्वर का महाप्रसाद होता है । ऐसा समर्पित प्रेम प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त होना दुर्लभ है । कहा जाता है कि पे्रम कभी किया नहीं जाता अपितु हो जाता है । प्रेम की कोई आयु नहीं होती । किसी भी आयु में किसी के भी प्रति हृदय के किसी कोने में पे्रम के अंकुर प्रस्फुटित हो सकते हैं । अविनाश के साथ ऐसा ही हुआ । उन्हें क्या पता था कि जिन्दगी के किसी मोड़ पर अनायास पीएल से भेंट होगी और हृदय के किसी कोने में पे्रम का यह नन्हा सा पौधा स्नेह के आंचल में लहलहाने लग जाएगा ।&lt;br /&gt;  अप्रत्यक्ष रूप से पे्रम के अंकुर अविनाश और पीएल दोनों के हृदय में  &lt;br /&gt;धीरे-धीरे पनपते रहे । प्रत्यक्ष रूप से पे्रम प्रदर्शित करना दोनों के लिए दुष्कर था । पीएल के लिए भी  मर्यादा का उल्लंघन करना अत्यन्त कठिन था । दोनों अपनी कोमल भावनाओं को प्रत्यक्ष करने में संकोच करते रहे । लेकिन सृष्टि के उपवन में खिले पुष्प की सुगन्ध को कौन बांध सकता है। उपवन में खिले पुष्प की सुगन्ध चारो दिशाओं मेें फैलना स्वाभाविक है और ऐसा ही हुआ । पीएल की सखी अनिता को अविनाश के प्रणय निवेदन का आभास हो गया । धीरे-धीरे यह सुगन्ध निकट सम्बन्धियों में फैलना प्रारंभ हो गई। प्रणय ज्वार को रोकना कठिन होता है । प्रणय की अग्नि ऐसी होती है, उसे जितनी हवा दोगे वह उतनी ही अधिक तीव्र होती जाती है। बुझने का नाम ही नहीं लेती ।&lt;br /&gt;  वसन्त अपने पूर्ण यौवन के साथ ऋतु विहार करने लगा । भंवरे पुष्पों के मकरन्द का पान करने में तन्मय हो गए । दिनकर अपनी किरणंे सम्पूर्ण प्रकृति के अंगों को स्पर्श कर फैला रहा था । मन्द-मन्द मलयाचल की मधुर बयार हृदय को उन्मादित किये जा रही थी  । पलाश अपने पूर्ण यौवन को बिखेर रहा था और अविनाया-पीएल का तृषित व्याकुल हृदय मिलन के लिए व्याकुल हो रहा था किन्तु अपने तृषित हृदय के उद्गारों को प्रिय के समक्ष कैसे प्रगट करें ? इसकी पीड़ा बार-बार हृदय को कचोटने लगी । अपने ही बिल्कुल निकट बैठी पीएल के केशपाश में अंगुलियाँ फेरते हुए अविनाश ने अपने प्रिय के माथे पर चुम्बन ऐसे जड़ दिया जैसे कोई निष्पाप पिता अपनी पुत्री के कपोलों पर चुम्बन जड़ देता है। मर्यादाओं का उल्लंघन करना अविनाश के बस से बाहर था तो पीएल अविनाश के कोमल स्नेहमय स्पर्श को पृथक करने  में असमर्थ थी। पीएल मुस्करा दी ।&lt;br /&gt;  ‘‘ अविनाश ! मेरी मानो तो तुम किसी अच्छी सी लड़की से विवाह कर लो । बहुत अच्छा रहेगा ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ नहीं जी , मन नहीं चाहता । बस एक निवेदन है ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ वह क्या ?‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ मुझे अपने आंचल में ही रहने दो । मेरे लिए इतना पर्याप्त है।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ तुम पागल हो गए हो । मै तुम्हारा विवाह करवा देती हूँ ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ किन्तु आपके समान कोई नहीं मिलेगा ।किल्कुल आपके जैसी..‘‘&lt;br /&gt;पीएल के अधरो ंपर इन्द्र्रधनुष के समान लम्बी मुस्कान उभर आई और वह खिलखिला पड़ी ।गुनगुनाने लगी -&lt;br /&gt;  ‘‘ आप जैसा कोई मेरी जिन्दगी में आए तो बात बन जाएं ...‘‘?&lt;br /&gt;  ‘‘ आपने ठीक ही कहा, न कोई आपकी जैसी लड़की मिलेगी और न हम विवाह करेंगे ।‘‘&lt;br /&gt;पीएल ,अविनाश की इस बात पर खिलखिलाकर हंस पड़ी ।&lt;br /&gt;  ‘‘ आप अपने हृदय की भावनाओ को अच्छी तरह प्रस्तुत करते हो लेकिन आप मुझे नहीं पा सकते ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ कोई बात नहीं । आपके आंचल का सहारा ही मेरे लिए पर्याप्त है।‘‘&lt;br /&gt;भावनाओं के आवेश में अविनाश ने अनायास झुककर पीएल के चरणों पर अपने अधरों को रखकर चूम लिया ।&lt;br /&gt;  ‘‘ आप मुझसे इतना पे्रम करते हो लेकिन मैं विवाहिता हूँ और जो उचित नहीं उसे कैसे स्वीकार कर सकती हूँ ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ हमें केवल आपके आंचल का सहारा चाहिए और कुछ  भी नहीं । हम सारा जीवन आपके सहारे व्यतीत कर देंगे ।‘‘&lt;br /&gt;पीएल मोम की तरह पीघल गई । अविनाश के हाथों को अपने हाथंो में ले सान्त्वना भरे लहजे में बोली-&lt;br /&gt;  ‘‘मैं सारा जीवन आपके साथ हूँ अवि....आप चिन्ता न करें लेकिन मुझे भी विवाहित जीवन का पालन करना होगा ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ हमें कोई आपत्ति नहीं । आप जैसे रखोगे वैसे हम रहेंगे ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ तो फिर मेरा कहना मानना होगा ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ हम आपके प्रत्येक आदेश का पालन करेंगे ।‘‘&lt;br /&gt;अपने हाथों को पीएल के हाथो से अविनाश पृथक नहीं करना चाहते थे । इसलिए उन्होंने पीएल के हाथांे को अपने वक्ष से लगा लिया और आँखें मूँद ली । अनायास अविनाश की आँखांे से अजस्र अश्रु धाराएं बह निकली ।&lt;br /&gt;  समस्त विश्व में पे्रम ही एक ऐसा तत्व है जो किसी बन्धन, किसी मर्यादा, किसी विधान किसी जाति और धर्म और बुद्धि और ज्ञान को स्वीकार नहीं करता । चाहे मीरा-श्याम हो,बाजीराव-मस्तानी हो अथवा बच्चन-तेजी हो । पे्रम अपने विशाल हृदय में निर्भिकता और अत्यन्त कोमल होकर पुष्प की भांति तूफान में वक्ष ताने खड़ा रहता है ।&lt;br /&gt;  यह भी अटल सत्य है कि सच्चे पे्रमी कभी भी मिल नहीं पाते । इतिहास साक्षी है कि बाजीराव-मस्तानी, हीर-रांझा, शीरी-फरहाद और पुरूरवा-उर्वशी कभी एक दूसरे को पा नहीं सके । यही स्थिति अविनाश और पीएल के सामने श्ूार्पणखा के समान विकराल मुख पसार कर खड़ी हो गई।.......&lt;br /&gt;  प्रातः रवि की प्रथम किरणों के साथ अविनाश आज पीएल के समक्ष अपने हृदय की अभिलाषा अभिव्यक्त करने के उद्देश्य से फूलों का एक सुन्दर गुलदस्ता लिए पहुँच गया । पीएल पिछली रात से अस्वस्थ्य होने के कारण शैया पर लेटी हुई थी । अविनाश गुलदस्ता पीएल के पैरों पर रख अधरों से पैरों को चूम लिया । पैरों पर स्पर्श का आभास पा पीएल ने धीरे-धीरे नेत्र खोले । सामने अविनाश को खड़ा पाया ।&lt;br /&gt;  ‘‘ आपने यह क्या किया ?‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ अपने भगवान के श्रीचरणों में अपना हृदय प्रस्तुत किया है ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ पागल हो , पूरे पागल ।‘‘&lt;br /&gt;अविनाश मुस्करा भर दिए और पीएल के सिरहाने बैठ केशों में अंगुलियाँ फेरने लगे ।&lt;br /&gt;  ‘‘ ओह ! आपको तो ज्वर है ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ नहीं ,थोड़ी सी हरारत है , कम हो जाएगी । सिर में पीड़ा हो रही है।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ लाओ , सिर दबा दूँ ।‘‘&lt;br /&gt;अविनाश आहिस्ता-आहिस्ता पीएल के माथे को दबाने लगे । पीएल नेत्र मूँद निश्चेष्ट लेटी रही । बहुत देर तक अविनाश,पीएल के माथे को दबाते रहे ।&lt;br /&gt;  ‘‘ लाओ पैर .....‘‘&lt;br /&gt;इन्कार किए बग़ैर पीएल ने अपने दोनों पैर अविनाश की ओर बढ़ा दिए । अविनाश धन्य हो गए । पीएल के श्रीचरणो को अपने गोद में रख लिया । थोड़ा झुके और आहिस्ता से पीएल के पैरों को चूम लिया । पीएल ने कोई प्रतिकार नहीं किया । वह निश्चेष्ट लेटी रही । अविनाश स्वयं को धन्य समझने लगे । आत्मा से किया गया पे्रम कभी भी कलुषित भावनाओं को जन्म नहीं देता अपितु निश्चल पे्रम सेवा,त्याग,समर्पण से ओतप्रोत होता है । हृदय से किया गया पावन पे्रम व्यक्ति को भावविभोर कर देता है और उसे परमानन्द की उपलब्धि होने लगती है । अविनाश के हृदय में पीएल के प्रति प्रगाढ़ पे्रम की गंगा उमड़ने लगी । दूसरी ओर पीएल के हृदय में सूक्ष्म रूप से अनियंत्रित पे्रम का ज्वार उमड़ उठा । अविनाश का पावन पे्रम प्रिय के चरणों को वक्ष से लगाकर धन्य-धन्य हो रहा था तो पीएल का पे्रम अविनाश को ललकार रहा था । कहा जाता है कि नारी में पे्रम का अन्तिम बिन्दु काम होता है। लेकिन अविनाश पावन पे्रम के उन्माद में एक नारी के कामोन्माद को पहचान नहीं पा रहे थे । वे तो पे्रम पूजन में इतने  मस्त थे कि एक औरत एकान्त में पुरूष के संसर्ग में लिप्त है किन्तु पुरूष को प्रकृति की अनौखी लिप्सा का आभास नहीं । पवित्र पे्रम अपनी कसौटी पर सत्य ही उतरता है ,चाहे नारी जो कुछ भी समझे । क्या यह अविनाश की जीत है अथवा हार ? विधाता ही जाने किन्तु अविनाश अपने पे्रम को कलुषित नहीं होने देना चाहते थे । पे्रम में हार-जीत समान होती है ।&lt;br /&gt;  पावन पे्रम की सदा विजय होती है और वह सर्वोच्च शिखर पर पहुँचता है । जबकि इसके विपरीत लेशमात्र की कमी होने पर प्रतिकूल स्थिति उत्पन्न हो सकती है । किन्तु काम-रति के खेल में पावन पे्रम का कोई स्थान नहीं होता । नियति के विधान के अनुसार प्रकृति ने प्रतिकूल खेल रचना प्रारंभ कर दी । अविनाश और पीएल के बीच भूचाल उत्पन्न हो गया ।&lt;br /&gt;  भूचाल,भूमि-धरातल को यहाँ तक कि पे्रम के मूलाधार को झटका दे गया और सूखा दिया उन खिलते हुए पुष्पों को जो उपवन में मधुर बयार बिखेर रहे थे और मदमस्त भौंरों को उन्मादित कर रहे थे । हिला दिया उस पूजारी को जो अपने देव की पूजा मेें मस्त था और समूचे विश्व को विस्मृत कर रहा था । भक्त को भगवान से पृथक  करने में असुरी शक्तियों का जितना बल होता है उतना बल पे्रमियों को पृथक करने में अविश्वसनीय तत्वों का होता है। &lt;br /&gt;  अर्पणा का पदार्पण असुरी शक्तियों को प्रबल करने में सहयोग प्रदान करने लगा । पूजारी को अपने देव से पृथक करने में अर्पणा ने विशेष भूमिका निभाई। पीएल के प्रति अविनाश की प्रणयमयी कोमल भावनाओं को अर्पणा भलिभांति जानती थी जिसके कारण अविनाश की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने लगी । परिणामस्वरूप पीएल आहिस्ता-आहिस्ता अविनाश से दूर रहने लगी लेकिन यह दूरी हृदय की दूरियों को कम न कर सकी ।&lt;br /&gt;  एक शाम जब अविनाश बच्चों को पढ़ा रहे थे ,पीएल उनके बिल्कुल पास बैठी हरी सब्जियाँ काट रही थी । बीच-बीच में अविनाश से बातें भी कर रही थी ।&lt;br /&gt;  ‘‘ अवि ! तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो ?‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘क्योंकि हम आपसे पे्रम करते हैं । अपने पावन हृदय से आपको पूजते हैं लेकिन आपसे चाहते कुछ नहीं । केवल आपके आंचल के सहारे रहना चाहते हैं ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ जो संभव नहीं है आप उसे नहीं पा सकते ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ मुझे पाने की कामना नहीं है लेकिन ऐसी कोई बात है तो एक दिन हम आपक पा ही लेंगे ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ ऐसा कभी नहीं हो सकता ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ चिन्ता की कोई बात नहीं । लेकिन हमें अपने से दूर नहीं करना । बस यही प्रार्थना है । यदि स्वीकार नहीं कर सकते हो तो हमें ज़हर दे दो । आपसे बिछड़ने से बेहतर होगा हम मृत्यु को गले लगा लें ।‘‘&lt;br /&gt;अविनाश का कण्ठ अवरूद्ध हो गया और नेत्र भर आएं। उनका हृदय चाह रहा था,इस वक्त वे पीएल के आंचल में अपना मुख छिपाकर फूट-फूटकर रो लें किन्तु उनका साहस नहीं हो पाया । वे रूमाल से अपने आँसू पोंछते हुए बाहर निकल गए ।&lt;br /&gt;  इस घटना के उपरान्त लम्बी अवधि तक अविनाश कभी पीएल के सामने नहीं पहुँचे । अपने ठीक सामने के मकान में रहने के बाद भी अविनाश,पीएल को स्पर्श करना तो दूर वे दो शब्द बतियाने के लिए भी व्याकुल होने लगे ।&lt;br /&gt;  अर्पणा ने अविनाश की इस कमजोरी का लाभ उठाने में कोई नहीं की । अर्पणा ने पीएल से घनिष्ठता  बढ़ा ली । अविनाश सदैव पीएल के खयालों में खोये-खाये अर्पणा से पीएल के विषय में बातें करते रहते । अर्पणा मनगढ़न्त बातें बनाकर पीएल के प्रेम की दुहाई दिया करती । अत्यन्त संवेदनशील होने के कारण अविनाश,पीएल का पे्रम और निकटता पाने के लिए लालायित होने लगे । छटपटाने लगे । एकान्त में बिफर-बिफर कर रोने लगे ।&lt;br /&gt;  ‘‘ मैं पीएल के लिए प्रज्यापत्य व्रत करना चाहता हूँ अर्पणा ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ यह तो बहुत कठिन व्रत होता है।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ हाँ, होता है लेकिन  पीएल रूठ गई है उसे मनाने के लिए यह व्रत करना होगा ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ क्या तुम यह व्रत कर पाओगे ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ मैं अपनी पीएल के लिए इससे भी कठिन कोई व्रत होगा तो उसे भी करना चाहूँगा । चाहे मेरे प्राण निकल जाए । इसकी मुझे तनिक भी चिन्ता नहीं ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ जैसा तुम उचित समझो ।‘‘&lt;br /&gt;अविनाश ने बारह दिन का प्रज्यापत्य व्रत प्रारंभ कर दिया। परिणामस्वरूप अविनाश का शरीर अत्यन्त कमजोर हो गया । नेत्र भीतर धंस गए । वक्ष की पसलियाँ बाहर निकल आई । मुखमण्डल निश्तेज हो गया । कुछ ही समय में अविनाश मृत देह की तरह हो गए । शैया पर अर्ध लेटी अवस्था में अविनाश छत की ओर निर्निमेष निहारा करते । उस दिन उनके मित्र बीएस उनके पास बैठे थे ।&lt;br /&gt;  ‘‘ तुमको इतना कठिन व्रत नहीं करना चाहिए था । आखिर इस व्रत से तुमको क्या लाभ हो सकता है।‘‘&lt;br /&gt;अविनाश के सजल नेत्रों से अश्रु धाराएं बह निकली ।&lt;br /&gt;  ‘‘ एक बात कहूँ अविनाश ! यदि तुम अन्यथा न समझो ?‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ क्या कहना चाहते हो । मैं कदाचित अन्यथा नहीं लूँगा ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ तुमको रोग हो गया है भयंकर रोग,जिसकी कोई चिकित्सा नहीं है।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ भयंकर रोग ! कौन सा रोग ?‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ तुमको पीएल का पिलोरिया हो गया है।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ पिलोरिया .!‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ हाँ ! पीएल का पिलोरिया । मैं नहीं जानता पीएल का भावार्थ क्या होता है । लेकिन यह सच है।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘क्या तुम पीएल का भावार्थ जानना चाहते हो ?‘‘&lt;br /&gt;अविनाश के चेहरे पर वेदना की रेखाएं उभर आई जिसे बीएस अच्छी तरह पढ़ रहे थे किन्तु अविनाश की विकट मानसिक दशा के समक्ष वे चुप रहे ।&lt;br /&gt;  ‘‘ तो सुनो ,पीएल का शब्दार्थ पे्रमलता होता है । पी फार पे्रम और एल फार लता । पीएल यानी पे्रमलता । यह उनका नाम है बीएस ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ अर्थात् तुम्हारे मकान के सामने.‘‘&lt;br /&gt;‘‘ हाँ ,मैंने तुमको कहा था । शायद मुझे युगों-युगों से इनकी  ही तलाश थी लेकिन इस जनम में भी.‘‘&lt;br /&gt;अविनाश इतना कह चुप हो गए ।?&lt;br /&gt;  ‘‘ अविनाश ! तुम पे्रम में असफल हो गए हो । मैं जानता हूँ तुम्हारा पे्रम सच्चाईयों को छूनेवाला पे्रम है लेकिन खैर, मेरी एक सलाह मानोगे ?‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ पे्रम सलाह का मोहताज नहीं होता बीएस ।‘‘&lt;br /&gt;  ‘‘ तो तुम यों ही घुल-घुलकर मर जाओगे पीएल के पिलोरिया में....‘‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और यह सत्य घटित हो गया । अविनाश, पीएल की याद में घुल-घुलकर मृत्यु को प्राप्त हो गए । कहते हैं आज भी अविनाश की व्याकुल आत्मा पीएल यानी पे्रमलता के वियोग में कल्पतरू अपार्टमेंट के आसपास भटकती रहती है।&lt;br /&gt;0&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-827635263932287849?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/827635263932287849/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_8252.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/827635263932287849'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/827635263932287849'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_8252.html' title='पिलोरिया--कहानी --कृष्णशंकर सोनाने'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-9148093877470140348</id><published>2012-01-28T03:24:00.000-08:00</published><updated>2012-01-28T03:26:20.582-08:00</updated><title type='text'>आदमी के हक में..संकलन से--कृष्णशंकर सोनाने</title><content type='html'>छत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस तरह तन को ढंकने के लिए&lt;br /&gt;कपड़ों का होना जरूरी है ।&lt;br /&gt;जिस तरह&lt;br /&gt;लाज रखने के लिए&lt;br /&gt;शर्म का होना लाजमी है ।&lt;br /&gt;जिस तरह&lt;br /&gt;रहस्य ढांकने के लिए&lt;br /&gt;गोपन का होना आवश्यक है ।&lt;br /&gt;जिस तरह&lt;br /&gt;सिर छिपाने के लिए?&lt;br /&gt;छत का होना जरूरी है ।&lt;br /&gt;दीवारों का होना&lt;br /&gt;कोई मायने नहीं रखता&lt;br /&gt;खिड़की दरवाज़ों के बिना&lt;br /&gt;काम चलाया जा सकता है ।&lt;br /&gt;लेकिन&lt;br /&gt;बहुत ही नामुमकिन है&lt;br /&gt;जीवन का&lt;br /&gt;गुजन-बसर होना&lt;br /&gt;छत के बिना ।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;8-दरवाज़ा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिना दरवाजे के कोई&lt;br /&gt;घर नहीं बनता ।&lt;br /&gt;बाहर से दरवाज़ा&lt;br /&gt;बन्द करना जरूरी नहीं है&lt;br /&gt;घर की दहलीज&lt;br /&gt;पार करना अपशकुन माना जाता है ।&lt;br /&gt;अहं की सांकल,मद की नामपटट्ी&lt;br /&gt;मोह का ताला देख &lt;br /&gt;बिदक जाते हैं लोग&lt;br /&gt;ऐसे में बन्द रखोगे दरवाज़ा तो&lt;br /&gt;दस्तक देंगे ही लोग ।&lt;br /&gt;लोगों के गले में ही&lt;br /&gt;लटके होते हैं दरवाज़े&lt;br /&gt;जहाँ भी जाते हैं&lt;br /&gt;साथ लिए चलते हैं ।&lt;br /&gt;मैं घर बनाऊँ ना बनाऊँ&lt;br /&gt;दरवाज़े में सांकल ताला और&lt;br /&gt;नामपट्टी नहीं होगें&lt;br /&gt;खिड़कियों का तो सवाल ही नहीं&lt;br /&gt;सपने सारे आकर रूक जाते हैं बाहर&lt;br /&gt;खिड़की और दरवाज़ों के&lt;br /&gt;जब भीतर और कोई होता है&lt;br /&gt;और पहरा दे रहे होते&lt;br /&gt;सांकल,ताले और नामपट्टी ।&lt;br /&gt;दरवाज़ों का संबंध होता है&lt;br /&gt;खुले आसमान से&lt;br /&gt;उड़ती रहती जिसमें&lt;br /&gt;राजहंस सी धवल चिडि़या&lt;br /&gt;और सटे होते हैं आंगन&lt;br /&gt;पेड़-पौधे फूल पत्तियाँ&lt;br /&gt;और खिलखिलाते रहते हैं बच्चे ।&lt;br /&gt;दरवाज़े सपने देखते हैं&lt;br /&gt;रख जाए कोई आकर&lt;br /&gt;टिमटिमाता हुआ दीपक&lt;br /&gt;उनकी चैखट पर ।&lt;br /&gt;दरवाज़े होने से&lt;br /&gt;अन्तराल बढ़ जाता है&lt;br /&gt;तेरे,मेरे और उनके बीच&lt;br /&gt;बिछ जाती सन्नाटे की लम्बी चादर&lt;br /&gt;जब कभी तलाश&lt;br /&gt;करनी हो अपनी&lt;br /&gt;अपने से अलग हटकर अलहदा&lt;br /&gt;तोड़ना होगा हमें&lt;br /&gt;घर के सारे दरवाज़े&lt;br /&gt;खोलना होगा हमें&lt;br /&gt;घर की सारी खिड़कियाँ ।&lt;br /&gt;0&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-9148093877470140348?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/9148093877470140348/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_2677.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/9148093877470140348'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/9148093877470140348'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_2677.html' title='आदमी के हक में..संकलन से--कृष्णशंकर सोनाने'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-1253321595362898630</id><published>2012-01-28T03:22:00.000-08:00</published><updated>2012-01-28T03:24:38.088-08:00</updated><title type='text'>आदमी के हक में..संकलन से</title><content type='html'>बस्ती के लोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलग-अलग धड़ों में बंट गए है&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग&lt;br /&gt;बैठ बारूद पर तिलियाँ जला रहे हैं&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग ।&lt;br /&gt;भाई-चारा भूल बैठे है&lt;br /&gt;नफरत की गांठ ऐंठ बैठे हैं&lt;br /&gt;अपने मुख में कड़वी ज़बान&lt;br /&gt;बरसों से लुकाए बैठे हैं&lt;br /&gt;अड़ौसी-पड़ौसी दुआ-सलाम&lt;br /&gt;भूल बैठे है मेरी बस्ती के लोग&lt;br /&gt;अलग-अलग धड़ों में बंट गए है&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग ।&lt;br /&gt;रिश्ते-नाते कड़वे हो गए&lt;br /&gt;अपने ही वाले भड़वे हो गए&lt;br /&gt;घर अपनों का जलते देख-देख&lt;br /&gt;बगले झांपते तड़वे हो गए&lt;br /&gt;अब तो मान मार्यादा भूल बैठे है&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग ।&lt;br /&gt;अलग-अलग धड़ों में बंट गए है&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग ।&lt;br /&gt;कौन किसी पर करें भरोसा&lt;br /&gt;पे्रम-प्याली में ज़हर परोसा&lt;br /&gt;आनन-फानन मेल मिलाप है&lt;br /&gt;फैला रखा है औपचारिकता का भूसा&lt;br /&gt;जिस माला में फूल गूँथे हो&lt;br /&gt;गोले-बारूद पिरो रहे है&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग ।&lt;br /&gt;अलग-अलग धड़ों में बंट गए है&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग ।&lt;br /&gt;( दिः 01.03.2011)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;59-नास्टेल्जिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुलसी,जायसी और मीरा ने नहीं कहा,और&lt;br /&gt;न ही कबीर या मुक्तिबोध ने कहा&lt;br /&gt;बल्कि आप,हम सभी देख रहे हैं&lt;br /&gt;गाँधी के तीनों बन्दर भी अंजान नहीं है&lt;br /&gt;लेकिन फिर भी&lt;br /&gt;अन्यमनस्क होकर निरपेक्ष भाव से&lt;br /&gt;टकटकी लगाए हुए है&lt;br /&gt;जो हो रहा है उसे&lt;br /&gt;महज़ साक्षी होकर देख रहे है ।&lt;br /&gt;परिवर्तन चाहे हो या न हो&lt;br /&gt;लेकिन जो रोग घुन् बनकर लग चुका है&lt;br /&gt;वह भीतर तक खोखला कर रहा है&lt;br /&gt;विवश है गाँधी और विवेकानन्द&lt;br /&gt;चाहकर भी बदल नहीं  पा रहे है मानसिकता&lt;br /&gt;कर्णधारों और ऊँचे पदों पर आसीन&lt;br /&gt;महामहिमों की ।&lt;br /&gt;भीतर तक पूर्वाग्रह से ग्रसित रोग&lt;br /&gt;इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ता&lt;br /&gt;जब तक कि हम स्वयं अपनी इच्छाशक्ति को&lt;br /&gt;दृढ़ बनाने का संकल्प नहीं लेते ।&lt;br /&gt;समूची मानवता ताक रही है&lt;br /&gt;उस ओर&lt;br /&gt;जहाँ से उसे पूरी उम्मीद है कि&lt;br /&gt;एक न एक दिन&lt;br /&gt;इस महारोग से मुक्ति मिल जाएगी&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;समरता की जड़ों में कोपलें फूटेगी&lt;br /&gt;वसुन्धरा हरी-भरी हो जाएगी&lt;br /&gt;मुक्तिबोध एक बार फिर मुस्कराएंगे&lt;br /&gt;कहेंगे&lt;br /&gt;घुन् लगे इस रोग को सींचों मत&lt;br /&gt;इसे समूल नष्ट कर दो&lt;br /&gt;कि लहलहाऐ मानवता&lt;br /&gt;चाहे कितनी भी संकटापन्न स्थिति हो&lt;br /&gt;कोइै तो इलाज होगा&lt;br /&gt;इस बीमारी का ।&lt;br /&gt;( 03.03.2011) गुरूवार 6.00प्रातः&lt;br /&gt;रिश्ते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्त तो मिलते नहीं&lt;br /&gt;दुश्मन मिल जाय बहुत बड़ी बात है&lt;br /&gt;अपने तो गले लगते नहीं&lt;br /&gt;गले,पराए लग जाए&lt;br /&gt;सबसे बड़ी बात है&lt;br /&gt;तुम तो खालिस लेन देन की बातें करते हो&lt;br /&gt;कुछ दिया तो कहते हो&lt;br /&gt;मेरे अजीज है आप&lt;br /&gt;कुछ लिया तो कहते हो&lt;br /&gt;दुश्मन मेरे लगते हो ।&lt;br /&gt;दोस्त तो तुम लगते नहीं&lt;br /&gt;ना ही तुम अपने लगते हो&lt;br /&gt;दुश्मन बन जाओ तो बहुत अच्छी बात है&lt;br /&gt;कम अज कम दुश्मनी का रिश्त तो कायम रहेगा ।&lt;br /&gt;00&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-1253321595362898630?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/1253321595362898630/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_5751.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1253321595362898630'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1253321595362898630'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_5751.html' title='आदमी के हक में..संकलन से'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-1879833688399140949</id><published>2012-01-28T03:20:00.000-08:00</published><updated>2012-01-28T03:22:50.342-08:00</updated><title type='text'>आदमी के हक में..संकलन से</title><content type='html'>चाँद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे जागने से लेकर&lt;br /&gt;सोने तक&lt;br /&gt;वह मुस्तैद रहता है&lt;br /&gt;मेरे साथ ।&lt;br /&gt;जब मैं&lt;br /&gt;सो रहा होता&lt;br /&gt;वह जागते रहता है&lt;br /&gt;जैसे पहरा दे रहा हो&lt;br /&gt;जब मैं&lt;br /&gt;चल रहा होता&lt;br /&gt;वह मेरे साथ-साथ चलने लगता है&lt;br /&gt;मेरे ठहरने पर&lt;br /&gt;वह भी ठहरता है&lt;br /&gt;मैं भले ही थोड़ा सुस्ता लूँ&lt;br /&gt;वह बराबर सजग रहा करता है&lt;br /&gt;सुस्ताना उसने सीखा नहीं&lt;br /&gt;लेकिन जब मैं&lt;br /&gt;जाग जाता हूँ&lt;br /&gt;वह सो जाता है&lt;br /&gt;जागने की तैयारी में&lt;br /&gt;क्योंकि उसे पता है&lt;br /&gt;मेरे सो जाने पर&lt;br /&gt;उसे पहरा देना होगा&lt;br /&gt;मुस्तैद होकर ।&lt;br /&gt;( दिनांक 21.09.2010)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहने पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहने पर&lt;br /&gt;कभी चाहा हुआ नहीं होता&lt;br /&gt;अनचाहा हो जाता है।&lt;br /&gt;चाहने पर&lt;br /&gt;यदि चाहा हुआ हो जाय तो&lt;br /&gt;हम कहते हैं&lt;br /&gt;यह तो होना ही था&lt;br /&gt;इसलिए हो गया ।&lt;br /&gt;चाहने पर&lt;br /&gt;न तो राम का अभिषेख हुआ&lt;br /&gt;न ही पाण्डवों को राज्य मिला ।&lt;br /&gt;चाहने पर&lt;br /&gt;कभी नहीं बन पाती कोई कविता&lt;br /&gt;कोई अच्छी सी कहानी&lt;br /&gt;कोई आख्यान ।&lt;br /&gt;चाहने पर&lt;br /&gt;कुछ होना होता तो हो जाता&lt;br /&gt;जैसे कोई राजनेता&lt;br /&gt;लुच्चा,लफंगा,चिढ़ीमार ।&lt;br /&gt;( नवम्बर,2010)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेम करने के लिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पे्रम करने के लिए&lt;br /&gt;एक प्रिय का होना जरूरी है&lt;br /&gt;जिसकी मांग में&lt;br /&gt;भरा जा सके सिन्दूर&lt;br /&gt;मेरी चुटकी में भरा सिन्दूर&lt;br /&gt;किस मांग में भरूँ&lt;br /&gt;न मैं किसी का प्रिय हूँ&lt;br /&gt;न कोई मेरा प्रिय बना&lt;br /&gt;मुझे तलाश है&lt;br /&gt;एक अदद प्रिय की ।&lt;br /&gt;( 31.12.2010)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरूरत से ज्यादा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर लोगों की यह आकांक्षा रहती&lt;br /&gt;कि उनके पास यह भी होता तो&lt;br /&gt;कितना अच्छा होता,या&lt;br /&gt;वह भी होता तो कितना अच्छा होता&lt;br /&gt;इसे और उसे पाने की उनकी आकांक्षा&lt;br /&gt;कुलांचे मारने लगती है,और&lt;br /&gt;उसे पाने के लिए&lt;br /&gt;जी जान से ज्यादा मेहनत करने लगते हैं&lt;br /&gt;और अन्ततः वे उसे पा ही लेते हैं&lt;br /&gt;हालांकि ऐसा नहीं कि&lt;br /&gt;उनके पास वह चीज पहले नहीं थी&lt;br /&gt;लेकिन उनकी आकांक्षा थी&lt;br /&gt;जो चीज उनके पास है&lt;br /&gt;वह बहुत कम है&lt;br /&gt;शायद उनकी जरूरत इससे ज्यादा की है&lt;br /&gt;और यह चीज जरूरत से ज्यादा है&lt;br /&gt;जरूरत से ज्यादा चीज ज़हर बन जाती है।&lt;br /&gt;( दिनांक 03.03.2011)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-1879833688399140949?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/1879833688399140949/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_3212.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1879833688399140949'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1879833688399140949'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_3212.html' title='आदमी के हक में..संकलन से'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-98654956357859754</id><published>2012-01-28T03:18:00.000-08:00</published><updated>2012-01-28T03:20:55.317-08:00</updated><title type='text'>आदमी के हक में...संकलन से</title><content type='html'>विश्वास&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह इतना विश्वास करने लगती है कि&lt;br /&gt;उसके विश्वास पर विश्वास&lt;br /&gt;होने लगता है&lt;br /&gt;और उसके विश्वास के विश्वास पर&lt;br /&gt;विश्वास करना ही पड़ता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके विश्वास में&lt;br /&gt;इतना विश्वास है कि&lt;br /&gt;अ-विश्वास का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर उसका विश्वास&lt;br /&gt;इतना विश्वसनीय होता है कि&lt;br /&gt;उस पर विश्वास करना लाजमी है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्वास की डोर&lt;br /&gt;विश्वास पर टिकी है&lt;br /&gt;देखना &lt;br /&gt;कभी टूटने न पाए ।&lt;br /&gt;000&lt;br /&gt;अम्मा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह-सबेरे चार बजे उठती है अम्मा&lt;br /&gt;बर्तन-भाण्डे मांजने के बाद&lt;br /&gt;नल में पानी आते ही&lt;br /&gt;भर लेती है घर के सारे बर्तन भाण्डे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताजे-ताजे पानी से&lt;br /&gt;हाथ मुँह धोकर&lt;br /&gt;दो लोटा निरा पानी पी लेती है&lt;br /&gt;कहती है इससे हाजत अच्छी होती है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गैस-चूल्हे पर चाय रखने के बाद&lt;br /&gt;आवाज़ देकर जगाती है&lt;br /&gt;भोर हो रही है&lt;br /&gt;उठो और मुँह-हाथ धो लो बेटे&lt;br /&gt;चूल्हे पर चाय चढ़ा दी है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारा दिन खटकती रहती है अम्मां&lt;br /&gt;कभी कपड़े सूखाने डालती है&lt;br /&gt;कभी दालें,बडि़यां और अचार को दिखाती है धूप&lt;br /&gt;बच्चों के कपड़े लत्ते तह कर रखती है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोपहर तक थक जाती है अम्मां&lt;br /&gt;सिरहाने तकिया रख थोड़ा सुस्ताने लगती है&lt;br /&gt;उठती है बराबर चार बजे&lt;br /&gt;चाय का टेम हो गया है बेटी&lt;br /&gt;घण्टे भर बाद तेरा पप्पा दफ्तर से आएगा&lt;br /&gt;नाश्ते-पानी का बन्दोबस्त कर बेटी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अम्मां सुबह से शाम तक यूं ही खटकते रहती है&lt;br /&gt;सारी चिन्ताओं जिम्मेदारियों को अपने सिर लेकर&lt;br /&gt;अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन करते हुए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब से ब्याह कर आई है अम्मां&lt;br /&gt;पल भर चैन से बैठी नहीं होगी&lt;br /&gt;रिश्तों की चादर ओढ़े&lt;br /&gt;सबकी खबर लेते हुए ।    &lt;br /&gt;00   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;औरत का स्वर्ग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़की होना जितना कठिन है&lt;br /&gt;उससे ज्यादा कठिन है&lt;br /&gt;औरत होना ।     &lt;br /&gt;लड़की और औरत होने में&lt;br /&gt;बहुत ज्यादा फर्क नहीं है&lt;br /&gt;लड़की तब तक लड़की रहती है&lt;br /&gt;जब तक वह औरत नहीं बन जाती ।        &lt;br /&gt;लड़की की परिभाषा और&lt;br /&gt;औरत की परिभाषा भी अलग-अलग होती है&lt;br /&gt;जैसे,&lt;br /&gt;लड़की आग का गोला होती है,तो&lt;br /&gt;औरत बर्फ की शीला होती है&lt;br /&gt;लड़कियाँ जल्दी भभक जाती है&lt;br /&gt;जबकि&lt;br /&gt;औरत धीरे-धीरे पिघलने लगती है ।&lt;br /&gt;लड़की की उष्मा और&lt;br /&gt;औरत की शीतलता में&lt;br /&gt;उतना ही फर्क है    &lt;br /&gt;जितना पे्रमिका की उष्मा और&lt;br /&gt;माँ की शीतलता में ।&lt;br /&gt;लड़की को स्पर्श करते ही&lt;br /&gt;झटके से करंट लग जाता है&lt;br /&gt;लेकिन&lt;br /&gt;औरत का स्पर्श बड़ा सुखदायी होता है ।&lt;br /&gt;लड़कियों का स्वर्ग यहीं होता है&lt;br /&gt;वह महकने लगती है&lt;br /&gt;वह चहकने लगती है&lt;br /&gt;बागों,उपवनों और वसन्त में&lt;br /&gt;सुगन्ध बिखेरते हुए ।&lt;br /&gt;औरत का स्वर्ग देखने में नहीं आया&lt;br /&gt;जबकि वह&lt;br /&gt;स्वर्ग रचती है सारी दुनिया के लिए&lt;br /&gt;सिवाय खुद को छोड़कर ।&lt;br /&gt;00&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-98654956357859754?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/98654956357859754/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_1125.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/98654956357859754'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/98654956357859754'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_1125.html' title='आदमी के हक में...संकलन से'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-2476088889391550412</id><published>2012-01-28T03:16:00.000-08:00</published><updated>2012-01-28T03:18:46.041-08:00</updated><title type='text'>आदमी के हक में...संकलन से</title><content type='html'>सुबह में लहराती सुबहें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई मेनका या&lt;br /&gt;उर्वशी ही होगी&lt;br /&gt;प्रातः की शीतल मधुर समीर में&lt;br /&gt;घर से निकलने पर&lt;br /&gt;चेहरे पर बांधे हुए दुपट्टा&lt;br /&gt;बचाने के लिए सुन्दरता ।,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं झुलसा न दें&lt;br /&gt;शीतल मधुर बयार&lt;br /&gt;इन मेनका उर्वशियों के&lt;br /&gt;मासूम चेहरे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हेमा,माधुरी,श्रीदेवी&lt;br /&gt;रेखा हो या ऐश्वर्या&lt;br /&gt;नहीं बांधती होगी दुपट्टा&lt;br /&gt;झुलसती धूप में या&lt;br /&gt;गर्म हवाओं के थपेड़ों में&lt;br /&gt;अपने लावण्यमयी चेहरे पर ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई खतरा नहीं सुन्दरता को&lt;br /&gt;चाहे हो कैसा भी मौसम ।&lt;br /&gt;रानी रूपमती हो या&lt;br /&gt;हो जीनत अमान&lt;br /&gt;दुपटट्े के पीछे का चेहरा&lt;br /&gt;सामान्य का सामान्य ही रहेगा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं सुन्दर हूँ, का भ्रम पाले&lt;br /&gt;यहां से वहां&lt;br /&gt;गाडि़यों पर हवा में&lt;br /&gt;बेपरवाह &lt;br /&gt;लहराती सुबहें&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आग से खेलती आग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितनी ही आग देखी है&lt;br /&gt;धधकते भभकते हुए&lt;br /&gt;आग के भीतर आग&lt;br /&gt;आग के बाहर आग&lt;br /&gt;आग के दरमियान आग ।&lt;br /&gt;कहते हैं&lt;br /&gt;लड़कियाँ आग होती है&lt;br /&gt;धीरे-धीरे जलना शुरू करती है&lt;br /&gt;लेकिन जब वह जलने लगती है&lt;br /&gt;आग बन जाती है&lt;br /&gt;शायद इसीलिए&lt;br /&gt;वह आग से खेलती है,और&lt;br /&gt;आग उससे खेलती है&lt;br /&gt;चाहे उसे&lt;br /&gt;लड़की कह लो&lt;br /&gt;चाहे आग ।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;16-प्यार करती हुई लड़कियां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यार करती हुई लड़कियां&lt;br /&gt;प्यार करती&lt;br /&gt;नज़र नहीं आती&lt;br /&gt;वह प्यार करती भी है या नहीं&lt;br /&gt;पता नहीं चलता&lt;br /&gt;उसका प्यार करना या न करना&lt;br /&gt;एक सा लगता है&lt;br /&gt;कभी लगता है कि वह&lt;br /&gt;बिल्कुल ही प्यार नहीं करती&lt;br /&gt;कभी यह लगता है कि&lt;br /&gt;वह साक्षात प्यार की मूरत है&lt;br /&gt;उसके प्यार करने,या&lt;br /&gt;न करने के बीच&lt;br /&gt;झूलना पड़ता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम यह समझते हैं कि&lt;br /&gt;वह प्यार करती भी है&lt;br /&gt;और नहीं भी करती है&lt;br /&gt;प्यार की परिभाषा &lt;br /&gt;हमें नहीं&lt;br /&gt;उसे मालूम है ।&lt;br /&gt;00&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-2476088889391550412?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/2476088889391550412/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_5296.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/2476088889391550412'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/2476088889391550412'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_5296.html' title='आदमी के हक में...संकलन से'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-8591073630397993905</id><published>2012-01-28T03:13:00.000-08:00</published><updated>2012-01-28T03:16:24.269-08:00</updated><title type='text'>आदमी के हक में..संकलन से</title><content type='html'>प्यार करने के लिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कब्र से अच्छी&lt;br /&gt;कोई जगह नहीं होती&lt;br /&gt;जहां मिल जाता है&lt;br /&gt;प्यार करने के लिए&lt;br /&gt;पूरा एकान्त।&lt;br /&gt; कोई देख लेगा&lt;br /&gt;के बहाने&lt;br /&gt;वंचित कर दिया जाता&lt;br /&gt;मैं जानता हूं&lt;br /&gt;यहां भी&lt;br /&gt;कोई नहीं आएगा&lt;br /&gt;प्यार करने के लिए&lt;br /&gt;इसे प्यार का&lt;br /&gt;सुखान्त कहूं &lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रूरता की संस्कृति&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस क्रूरता का पता&lt;br /&gt;नहीं चल सका है हमें अभी तक&lt;br /&gt;हमारे बीच आए उसे&lt;br /&gt;काफी लम्बा समय हो गया है।&lt;br /&gt;हम अपने आपको&lt;br /&gt;समझते हैं कुछ ज्यादा ही सभ्य और सुसंस्कृत&lt;br /&gt;यह एक अनूठी मिसाल है&lt;br /&gt;शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व की।&lt;br /&gt;भव्य प्रदर्शन कर&lt;br /&gt;कुण्ठित भावों को उत्सर्जित किया जाना&lt;br /&gt;कूरता की संस्कृति का अपनापन है।&lt;br /&gt;वह समय अब कहाँ रहा&lt;br /&gt;जाने किस चक्रव्यूह में भटक रहा होगा&lt;br /&gt;लगता है अब हम&lt;br /&gt;कुछ ज्यादा ही समझदार हो गए होंगे&lt;br /&gt;प्रतीक्षा कर रहे होंगे&lt;br /&gt;आप हम और सारे विज्ञजन&lt;br /&gt;ऊँट करवट कब बदलेगा और हम शान्तिपूर्ण सो रहे होंगे।&lt;br /&gt;किसी की परवाह किये बग़ैर&lt;br /&gt;शान्तिवन के सरोवर में डूबाए हुए पैर&lt;br /&gt;चैन की बंसी बजा रहे होंगे।&lt;br /&gt;रात हमारे पड़ौसी का बच्चा&lt;br /&gt;रोता रहा सारी रात&lt;br /&gt;माँ के वक्ष का सूख गया होगा दूध&lt;br /&gt;हम आलिंगनबद्ध पड़े रहे&lt;br /&gt;बहकी बहकी सुगन्ध ओढ़े हुए।&lt;br /&gt;पूर्वाग्रहों  से सजाए हुए  बुके&lt;br /&gt;कड़वी मुस्कराहटों के साथ&lt;br /&gt;कर रहे होगे हम अभिनन्दन&lt;br /&gt;भरी सभा में तालियों की गड़गड़ाहट के बीच ।&lt;br /&gt;इस छत के नीचे&lt;br /&gt;हम सभी हिंसक हो गए हैं&lt;br /&gt;अहिंसा का पाठ पढ़ाते-पढ़ाते ।&lt;br /&gt;जिस संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं हम&lt;br /&gt;कू्ररतम से क्रूरतम कू्ररता लिए हुए&lt;br /&gt;पता नहीं चल रहा है हम&lt;br /&gt;कहाँ जा रहे है।&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;15अगस्त,2007बुधवार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; गीत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;12-ऐसा लगता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब किसी मन्दिर में&lt;br /&gt;छप्पन भोग चढ़ाए जाते हैं&lt;br /&gt;बीसियों को भरपेट भोजन की&lt;br /&gt;संभावनाएं खत्म हो जाती है।&lt;br /&gt;ऐस लगता है&lt;br /&gt;जब कभी वस्त्राभूषण&lt;br /&gt;चढ़ाए जाते मन्दिरों में&lt;br /&gt;बहुत सारे वस्त्रहीन जिस्म&lt;br /&gt;नंगे रह जाते हैं।&lt;br /&gt;ऐसा लगता है&lt;br /&gt;जब तक तुम्हारे लिए&lt;br /&gt;मन्दिर मस्जिद&lt;br /&gt;गुरूव्दारे गिरजे&lt;br /&gt;बनाए जाते रहेंगे&lt;br /&gt;सिर छिपाने दरिद्र नारायण&lt;br /&gt;वंचित होते रहेंगे ।&lt;br /&gt;भूखे को भोजन&lt;br /&gt;न्नगे को वस्त्र&lt;br /&gt;सिर छिपाने छत&lt;br /&gt;मिलने की संभावनाएं&lt;br /&gt;तिरोहित हो रही है&lt;br /&gt;हे प्रभु ! मुझे बता&lt;br /&gt;तुम्हें कितने भोग&lt;br /&gt;और कितने वस्त्राभूषण &lt;br /&gt;और कितनी बार&lt;br /&gt;चढ़ाने पड़ेंगे ।&lt;br /&gt;कब तक छिनता रहेगा&lt;br /&gt;वंचितों के सिरों से छतें ।&lt;br /&gt;11.07.2008 शुक्रवार 2.45 पीएम&lt;br /&gt;00&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-8591073630397993905?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/8591073630397993905/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_2466.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/8591073630397993905'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/8591073630397993905'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_2466.html' title='आदमी के हक में..संकलन से'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-1876508843672190387</id><published>2012-01-28T03:11:00.000-08:00</published><updated>2012-01-28T03:13:51.661-08:00</updated><title type='text'>आदमी के हक में....संकलन से</title><content type='html'>जगह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलावा इसके हो क्या सकता है कि&lt;br /&gt;अब तक न बनवा सका&lt;br /&gt;हृदय में उनके ज़रा सी जगह।&lt;br /&gt;उम्र के उस पड़ाव पर होना चाहिए था&lt;br /&gt;जिस पड़ाव पर वे खड़े है&lt;br /&gt;जिस बात पर वे अड़े हैं&lt;br /&gt;चुनने की अकांक्षा लिए हुए कोई फूल&lt;br /&gt;बासा और उजड़ा हुआ बागान&lt;br /&gt;क्या करेंगे सजाकर वे।&lt;br /&gt;कब का हो जाना चाहिए था निर्णय&lt;br /&gt;या कैद हो जाना चाहिए थी उम्र भर की&lt;br /&gt;या खुल्ला छोड़ दिया जाना चाहिए था&lt;br /&gt;बेलगाम  भटकने के लिए।&lt;br /&gt;कम से कम बन ही जानी चाहिए थी अब तक जगह&lt;br /&gt;जिससे पुरसुकून हो सकें&lt;br /&gt;कि कैद कर लिया गया है उम्र भर&lt;br /&gt;कि खुल्ला छोड़ दिया गया हूं सांड की तरह ।&lt;br /&gt;फिर करना चाहता हूं निवेदन&lt;br /&gt;अब तो खुला छोड़ दो दरवाज़ा&lt;br /&gt;आ जा सकूं निस दिन चाहे जब&lt;br /&gt;बनवा सकू एक छोटी सी जगह&lt;br /&gt;हृदय के उनके किसी कोने में।&lt;br /&gt;00 01.07.2007...1ः30 बजे&lt;br /&gt;-जन्म दिन का गणित&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ ने बताया&lt;br /&gt;जिस दिन तू पैदा हुआ&lt;br /&gt;उस दिन पूनम की सुबह थी&lt;br /&gt;सारा दिन रिमझिम रिमझिम पानी बरस रहा था&lt;br /&gt;गाय,भैंस और बकरियाँ&lt;br /&gt;चरने चली गई थी जंगल&lt;br /&gt;स्कूल की छुट्टियाँ खत्म हो गई थी&lt;br /&gt;पड़ौसी की लड़की&lt;br /&gt;स्कूल जाने लग गई थी&lt;br /&gt;और हाँ ,जिस साल तू पैदा हुआ था&lt;br /&gt;उसी साल पं.जवाहरलाल नेहरू आये थे&lt;br /&gt;उद्घाटन करने कारखाने का&lt;br /&gt;लग गई थी तेरी नाक&lt;br /&gt;हाथों में उनके, और&lt;br /&gt;मुस्करा दिये थे पंडित नेहरू ।&lt;br /&gt;पूरे पचपनवे बरस के दिन&lt;br /&gt;जब ताजमहल को&lt;br /&gt;सातवे अजूबे में&lt;br /&gt;शामिल करने की मूहिम चल रही थी&lt;br /&gt;और निर्णय होना श्शेष रह गया था&lt;br /&gt;सप्ताह का सातवां दिन था&lt;br /&gt;महिने की सातवीं तारीख थी&lt;br /&gt;साल का सातवां महिना था&lt;br /&gt;सदी का सातवां वर्ष था&lt;br /&gt;यानी सभी सात सात सात।&lt;br /&gt;तब मैं अकेला एकान्त में बैठा&lt;br /&gt;लिख रहा हूँ जन्म दिन के गणित की कविता&lt;br /&gt;न केक न केण्डिल न मिठाई&lt;br /&gt;न ही कोई संगी-साथी&lt;br /&gt;और न ही कोई हेप्पी बर्थ डे टू यू ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;07.07.2007शनिवार रात 10.00बजे&lt;br /&gt;ऐसा कौन सा काम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके जीने या मरने से&lt;br /&gt;कोई फर्क  पड़नेवाला नहीं है&lt;br /&gt;जीये तो जीये अपनी बला से&lt;br /&gt;मरे तो मरे&lt;br /&gt;करना क्या है हमें&lt;br /&gt;किसी के जीने से&lt;br /&gt;कुछ होता हो तो बहुत अच्छी बात है।&lt;br /&gt;मोहल्ले के राधेश्याम की दारू&lt;br /&gt;छुड़वाकर जो किया है काम उसने&lt;br /&gt;काबिल ए तारीफ है&lt;br /&gt;कहां कहां नहीं ले गये&lt;br /&gt;उसके घरवाले उसे&lt;br /&gt;पीर-पैंगम्बर,मठ-मन्दिर&lt;br /&gt;तांत्रिक जानूटोना से लेकर&lt;br /&gt;पूजापाठ व्रत-उपवास करने तक&lt;br /&gt;सारे कर्मकाण्ड कर लिए।&lt;br /&gt;जीना उसका जीना होगा&lt;br /&gt;वर्ना  उसके जीने का कोई मतलब नहीं&lt;br /&gt;एक पौधा ही लगाया होता आंगन में&lt;br /&gt;प्याऊ ही खोल दिया होता राहगिरों के लिए&lt;br /&gt;पैंतालीस डीग्री धूप में सूखता हुआ कण्ठ&lt;br /&gt;कम अज कम शीतल हो जाता।&lt;br /&gt;बड़ी भारी क्षति हो जाती&lt;br /&gt;यदि उसके सीने में रहनेवाला पंछी&lt;br /&gt;आकाश की ऊँचाईयों के पार चला जाता&lt;br /&gt;बड़े सम्मान के साथ&lt;br /&gt;स्मशान भू तक चलते साथ-साथ&lt;br /&gt;शहर भर के लोग&lt;br /&gt;देते भीगी पलकों से श्रृद्धांजलि&lt;br /&gt;चढ़ाई जाती मालाएं&lt;br /&gt;उनकी तस्वीर पर&lt;br /&gt;आनेवाले वर्षों में&lt;br /&gt;मनाई जाती एक दिन  जयन्ती&lt;br /&gt;कहते भले आदम थे वे।&lt;br /&gt;जीने मरने से&lt;br /&gt;फर्क नहीं पड़ता&lt;br /&gt;परिवार समाज या देश को&lt;br /&gt;होती नहीं कोई क्षति&lt;br /&gt;भूला दिया जाता&lt;br /&gt;बाद दस दिन के&lt;br /&gt;कहनेवाले कह देते&lt;br /&gt;ऐसा कौन सा काम किया है।&lt;br /&gt; 29/.6/2007&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-1876508843672190387?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/1876508843672190387/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_1013.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1876508843672190387'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1876508843672190387'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_1013.html' title='आदमी के हक में....संकलन से'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-2065034774674102979</id><published>2012-01-28T03:09:00.000-08:00</published><updated>2012-01-28T03:10:58.469-08:00</updated><title type='text'>आदमी के हक में....संकलन से</title><content type='html'>भेडि़ए कभी छिपते नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;दुश्मन जब&lt;br /&gt;आपस में मिलना शुरू कर दे&lt;br /&gt;करें मित्रों की तरह व्यवहार&lt;br /&gt;लगे रिश्तों में अपनापन ।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;जब दुश्मन&lt;br /&gt;जागरूक हो जाए&lt;br /&gt;पेश आए सावधानी से&lt;br /&gt;मांगने लगे दुहाईयाँ&lt;br /&gt;लगे मिमियाने भेड़ों की तरह।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;जब दुश्मन&lt;br /&gt;उतारने लगे बलैया &lt;br /&gt;तारीफों के लगे बाँंधने पुल&lt;br /&gt;करने लगे मित्रों की बुराइयाँ।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;दुश्मन जब&lt;br /&gt;वर्जनाएं लगे तोड़ने&lt;br /&gt;पहनने लगे जामा सभ्यता का&lt;br /&gt;धतियाने लगे परम्परा&lt;br /&gt;लगे बिचकाने मुँह&lt;br /&gt;दिखाकर अपनापन ।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;जब दुश्मन&lt;br /&gt;चढ़ाने लगे मनौतियाँ&lt;br /&gt;पहनाने लगे माला फूलों की&lt;br /&gt;लगाने लगे मरहम घावों पर&lt;br /&gt;बगल में छिपाए हुए कटारी से&lt;br /&gt;छिलने लगे तलवें&lt;br /&gt;लगे खोजने अर्थ मलतब के ।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;दुश्मन जब&lt;br /&gt;मिलने लगे आपस में लगे&lt;br /&gt;साम्प्रदायिकों सी चलें चालें&lt;br /&gt;सभ्यता का दुशाला ओढ़े हुए ।&lt;br /&gt;आज हमारे बीच से ही&lt;br /&gt;कुछ दुश्मन कर रहें होंगे&lt;br /&gt;एक दूसरे के खिलाफ&lt;br /&gt;एक दूसरे के लिए&lt;br /&gt;धिनौना संघर्ष....&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;अपनत्व दिखाएं&lt;br /&gt;शेर की खाल में भेडि़ए&lt;br /&gt;कभी छिपते नहीं ।&lt;br /&gt;08.07.2008 मंगलवार&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताजमहल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताजमहल का ताजमहल होना&lt;br /&gt;सचमुच का ताजमहल होना है&lt;br /&gt;जैसे आगरे का ताजमहल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताजमहल यदि  सच्चा ताजमहल है&lt;br /&gt;वह पे्रम का मन्दिर होगा&lt;br /&gt;जैसे मैं और उनका पे्रम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताजमहल कहते सुनते ही&lt;br /&gt;रोमांचित हो उठता है जिसका तनम न&lt;br /&gt;समझो हो गया है उसे कुछ कुछ&lt;br /&gt;एक और ताजमहल बनाने का रोग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग घरों में ताजमहल नहीं&lt;br /&gt;पे्रम भवन सजा रखते हैं&lt;br /&gt;यादें  बनी रहे ताजा उम्रभर&lt;br /&gt;दिलाते हुए याद एक दूजे को।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तेरा शाहजहां ,मुमताजमहल तू मेरी&lt;br /&gt;गाते रहेंगे सुर ताल मिलाकर&lt;br /&gt;यमुना संभाले रखेगी जब तक&lt;br /&gt;पूरनमासी में जगर मगर करता ताजमहल ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्नत है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;हुस्न है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;इश्क है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;जिस्त है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;ख्वाब है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;यादें है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;तसव्वुर है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;सिर्फ  आगरे जाकर देखो यमुना किनारे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्नत , हुस्न, इश्क , जिस्त ,ख्वाब&lt;br /&gt;यादे-तसव्वुर एक साथ दिखाई देंगे&lt;br /&gt;जगर मगर करते हुए दुधिया रातो ंमें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताजमहल का ताजमहल होना ही&lt;br /&gt;सचमुच का पे्रममहल होना है&lt;br /&gt;जैसे आगरे का ताजमहल&lt;br /&gt;जैसे मैं और उनका पे्रम ।&lt;br /&gt;0000......28/06/2007&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-2065034774674102979?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/2065034774674102979/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_2586.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/2065034774674102979'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/2065034774674102979'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_2586.html' title='आदमी के हक में....संकलन से'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-5562201168431028573</id><published>2012-01-28T03:03:00.000-08:00</published><updated>2012-01-28T03:09:07.937-08:00</updated><title type='text'>आदमी के हक..संकलन से</title><content type='html'>कुत्ता और हड्डी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुत्ता हड्डी बड़ी देर तक चबाता है&lt;br /&gt;अक्सर उसे पूरे पांच साल लग जाते हैं&lt;br /&gt;चबाते हुए हड्डी&lt;br /&gt;हडड्ी चबाना उसका शगल है&lt;br /&gt;कभी कभी वह&lt;br /&gt;झपटट् मारता है&lt;br /&gt;दूसरे के मुंह से  छीनने के लिए&lt;br /&gt;कभी वह कामयाब होता है&lt;br /&gt;कभी वह नाकामयाब होता है&lt;br /&gt;एक बार मुंह में हड्डी आने पर&lt;br /&gt;वह इतनी मजबूती से दबाए रखता है&lt;br /&gt;कि कोई दूसरा कुत्ता झपट न लें उसके मुंह से&lt;br /&gt;गुर्राता भी है कुत्ता&lt;br /&gt;डराने के वास्त&lt;br /&gt;ताकि कोई दूसरा कुत्ता&lt;br /&gt;छीन न लें हड्डी उसके मुंह से&lt;br /&gt;चबाते चबाते हड्डी भले ही टूट जाए&lt;br /&gt;लेकिन छूटने न पाये मुंह से &lt;br /&gt;कोशिश लगातार चलती रहती है और चलते रहेगी&lt;br /&gt;कुत्ता कोई भी हो&lt;br /&gt;पूरे पांच साल तक&lt;br /&gt;हडडी चबाना उसका शगल हो जाता है।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदमी ब्लाउस जैसा कमीज पहन सकता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सवाल जहन में उठना लाजमी है&lt;br /&gt;शर्मो-हया की हद होती है या नहीं&lt;br /&gt;मुझे नहीं है ज्ञात&lt;br /&gt;किसी एक वर्ग की नही है यह बपौती&lt;br /&gt;वैसे शर्माे-हया आरक्षित है&lt;br /&gt;जैसे आरक्षित है&lt;br /&gt;सभ्यता,संस्कृति और&lt;br /&gt;कायदें सभी के लिए ।&lt;br /&gt;कायदों में ज्यादा छूट दी गई है&lt;br /&gt;जैसे खुली पीठ और&lt;br /&gt;नाभी दर्शन कराते हुए उजले पेट&lt;br /&gt;साँचीनुमा उभरे उरोज&lt;br /&gt;दिखाई देते मुख्य व्दार&lt;br /&gt;गोरी-गोरी मखमली लम्बी चिकनी बांहे&lt;br /&gt;झांकते हुए बगलों की कमनीयता&lt;br /&gt;लचकते कमर का भूगोल&lt;br /&gt;मौसम की दरकार नहीं&lt;br /&gt;ठिठुरते पौष में भी&lt;br /&gt;भला लगता है प्रदर्शन ।&lt;br /&gt;अक्सर सोचा करता हूं&lt;br /&gt;नख-शिख तक क्यों&lt;br /&gt;ढका होता है पुरूष&lt;br /&gt;पेंट फूल,शर्ट-फूल,कोट-फूल&lt;br /&gt;फूल मौजे तसनों से कसे जूते&lt;br /&gt;हाथों के पंजे&lt;br /&gt;गर्दन से सिर तक अंग&lt;br /&gt;जायज है सिर्फ दिखाने के वास्ते&lt;br /&gt;अपनी गरीमा बनाए रखने के लिए ।&lt;br /&gt;मेरी गुजारिश सिर्फ इतनी है&lt;br /&gt;मर्द ब्लाउस  जैसा कमीज&lt;br /&gt;पहन तो सकता है न ?&lt;br /&gt;चैड़ा वक्ष-पीठ,कमर उन्नत कांधे&lt;br /&gt;और नाभियुक्त उदर&lt;br /&gt;पौरूषता लिए विशाल वक्षस्थल पर&lt;br /&gt;लहराते घनकेशपाश&lt;br /&gt;दर्शन करवा तो सकता हैं&lt;br /&gt;रख सकते हैं सुड़ौल बलिष्ठ खुली भुजाएं&lt;br /&gt;पहन सकते हैं ब्लाउस जैसा कमीज ।&lt;br /&gt;सबसे अहं बात है&lt;br /&gt;मर्द अपने जिस्म पर&lt;br /&gt;कम से कम वस्त्र पहन&lt;br /&gt;कैटवाक कर सकता है रैंप पर...&lt;br /&gt;सुन्दरता का परचम&lt;br /&gt;फहराया जा सकता है&lt;br /&gt;इतनी तो मोहलत&lt;br /&gt;मिली ही चाहिए मर्द को ।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4-मैंने ईज़ाद की कविता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डमरू के डम डम से&lt;br /&gt;बिखर गए शब्द&lt;br /&gt;ब्रह्माण्ड के अण्ड से फूट पड़े स्वर&lt;br /&gt;वीणा के नाद से गूंज उठा नाद&lt;br /&gt;शंकर के नृत्य से तरल हुए भाव&lt;br /&gt;भारती के नयनों से निकल पड़ा विभाव&lt;br /&gt;शिव की जटा से बह निकली सरिता&lt;br /&gt;एकत्र कर सारे उपकरण&lt;br /&gt;मैने इजाद की कविता ।&lt;br /&gt;ऊषा के भाल पर&lt;br /&gt;छिड़क गया सिन्दूर&lt;br /&gt;सूरज की किरणों से&lt;br /&gt;बिखर गया नूर&lt;br /&gt;फूलों से टपक पड़ा&lt;br /&gt;कोमलता का भाव&lt;br /&gt;यौवन की चल पड़ी&lt;br /&gt;चंचल सी नाव&lt;br /&gt;मदमाती इतराती&lt;br /&gt;विहंस पड़ी गर्विता &lt;br /&gt;अम्बर के पास से&lt;br /&gt;मैंने ईजाद की कविता ।&lt;br /&gt;बरस पड़ा रस&lt;br /&gt;नवरंग नवरस में&lt;br /&gt;जीवन गया बस&lt;br /&gt;निर्धन की झोपड़ी में&lt;br /&gt;रिक्त पड़े कक्ष&lt;br /&gt;सीमा पर फौजी है&lt;br /&gt;कर्मठा में दक्ष&lt;br /&gt;ममता के आंचल से&lt;br /&gt;बहा नेह राग&lt;br /&gt;पी के अधरों पर&lt;br /&gt;पे्रममय पराग&lt;br /&gt;कली-कली,पुष्प-पुष्प&lt;br /&gt;भौरा है गाता&lt;br /&gt;सृष्टि के प्रांगण में&lt;br /&gt;मस्त हो जाता&lt;br /&gt;रच डाली शब्दों की&lt;br /&gt;सुन्दर सी सरिता&lt;br /&gt;अभिव्यंजना के रंगों से&lt;br /&gt;मैंने ईजाद की कविता ।&lt;br /&gt;000&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-5562201168431028573?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/5562201168431028573/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_28.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/5562201168431028573'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/5562201168431028573'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post_28.html' title='आदमी के हक..संकलन से'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-4994956922101738672</id><published>2012-01-28T03:00:00.000-08:00</published><updated>2012-01-28T03:03:06.843-08:00</updated><title type='text'>कृष्ण जन्म</title><content type='html'>थी मध्य निशा की पुनित बेला,औ’आच्छादित मेघ श्रृंखला व्यापाररजनिकर मुख छिपा क्षितिज मेंघुप् तम पथ था पारावार ।-1तिमिर में भी ज्योति पूँज आलोडि़त होताघनन् घनन् घन घनन् घनन् घन मेखलापार व्योम से झांकता वह चितवन चकोराजाने किसका होगा वह चंचल चपल छोरा ।-2मलयानिल बयार मधुर घ्राँण रंध सुवासितकौन है वह जो करता हृदय को विस्मितकौन है वह जो होता पुलकित बार बार कौन है वह जो प्रमुदित होना है चाहताकौन है वह जो होना चाहता  सृजनहार ।-3ऐसे में निपट कौन मौन अस्तित्व लिएविहंसता सह कुसुमित सा सुकुमारतड़-तड़ तोड़ लौह बन्ध मुक्त वहप्रगट हुआ एक शिशु बीच कारागार ।-4कोमल लघु पावन चरण धरा धरविभु नयन सम्मुख हो महा-मनोहरविहंस  पड़ी अधराधर मधु मुस्कानयही होगा इस युग का महान गान ।-5कोई कल्पनातीत निशा मध्य कर उजियालाकर अलौकिक तन-रजनि में था उगनेवालाउस पराशक्ति का अनुभूतिजन्य था विकासकर रहा था तम का वह पल क्षण उपहास ।-6जिस काल खण्ड में लोक लीलामय जनमताभव धनु वितान उस भू पर विभु का तनताविधि विधान विविधमय वह कर जातावह धरा पर उसी क्षण अवतरित हो जाता ।-7जिस क्षण सांसारिक माया स्वपन टूटतामहाकण्ठ से बरबस युगल गान गूँज उठतादिग-दिगन्त तक प्रतिध्वनित हो उठती तानसकल जगत उल्लासित गा उठता वह गान ।-8जिस क्षितिज से वह मन्द मन्द मुसकायाविधि ने रच दी अपनी अद्भूत मायासाधुजनों का करने को वह परित्राणसंकल्परत धर्मध्वजा का होगा अभ्युथान ।-9अवतरण तब उसका जब नाद ब्रह्म गुँजायाहो गई विमोहित वीणा-वादिनी की मायाझंकार उठी दिशा-दसों औ’अखिल ब्रह्माण्डविविध कण्ठ ने आवाहन उसका गाया ।-10अखिल विश्व प्रमुदित उल्लासित हो झूमाकिंकर-गन्धर्व-अप्सराएं मृदंग झाँझ नृत्य होमासमूह गान स्तुति लय ताल छन्द युगल हो गाएव्योम अवनि अम्बर तल अनन्त धरा भी घुमा ।-11खग-मृग-व्याघ्र जीव-जन्तु मानव हृदय हर्षायेलता कुँज वन नद नाल सरोवर अलसायेनहीं रूकता निरन्तर अल्हादित होता उल्लासउसके अधरों पर जगमग जगमग होता उजास ।-12पराजित होना उसने कभी सीखा नहींहारने पर भी सदा गुदगुदाता था रहताकभी चरण रज प्रक्षालन में पीछे हटा नहींहोकर अपमानित फिर भी वह था मुस्काता ।-13निकुँज कुँजवन में लुकता छुपता उसका छलवानाचपल चंचल चतुर चितचोर का चितरानाभला कौन नहीं चाहेगा ऐसे में भुजबन्ध मिलानावृषभानुसुता को मधुर मुरली का सुनाना ।-14मानवता की खारित उसने गान गीता का गायाजीवन सारा कर उत्सर्जित फिर भी वह मुस्कायामेरे कृष्ण तुम तो मेरे प्राणों के हो आधारआओ तो कर लूँ मैं तुमको जी भर के प्यार ।-15000&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-4994956922101738672?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/4994956922101738672/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/4994956922101738672'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/4994956922101738672'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='कृष्ण जन्म'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-6026792607671713004</id><published>2011-09-23T22:43:00.001-07:00</published><updated>2011-09-23T22:44:35.814-07:00</updated><title type='text'>लावा पुरस्कृत</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-GAWCeSEFRPc/Tn1uJNUxnCI/AAAAAAAAAVk/x4z1AZ1JmRM/s1600/Picture%2B001.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 356px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-GAWCeSEFRPc/Tn1uJNUxnCI/AAAAAAAAAVk/x4z1AZ1JmRM/s400/Picture%2B001.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5655797811521887266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि मेरा उपन्यास ''लावा '' तीन बार पुरस्कृत हुआ है,जो क्रमशः इस प्रकार हैः.1.नर्मदा प्रसाद खरे सम्मान,2009 कादम्बरी,जबलपुर 2.बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार,2008 रूपये 31000.व्दारा मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी 3.अंबिकाप्रसाद दिव्य पुरस्कार,2011 ..रूपये 5000 व्दारा मप्र राष्टभाषा प्रचार समिति ।&lt;br /&gt;                                                            ..कृष्णशंकर सोनाने&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-6026792607671713004?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/6026792607671713004/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2011/09/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/6026792607671713004'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/6026792607671713004'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='लावा पुरस्कृत'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-GAWCeSEFRPc/Tn1uJNUxnCI/AAAAAAAAAVk/x4z1AZ1JmRM/s72-c/Picture%2B001.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-1879594520543047085</id><published>2011-07-10T08:13:00.000-07:00</published><updated>2011-07-10T08:21:28.156-07:00</updated><title type='text'>सिवाय किताब के</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-y6Br8NLra40/ThnDa4JZujI/AAAAAAAAAVc/T3PYa9KFoZU/s1600/Picture%2B009.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 278px; height: 400px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-y6Br8NLra40/ThnDa4JZujI/AAAAAAAAAVc/T3PYa9KFoZU/s400/Picture%2B009.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5627744075891980850" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अब तक कोई मित्र न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई भाई न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई प्रेमिका न मिली..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई प्रेमी न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई पत्नी न मिली..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई रिश्ता न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई अपना न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कौई सोहबत न मिली..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई महफिल न मिली..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक किसी से ज्ञान न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई शिक्षा न मिली..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई इन्सान मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई गपबाज न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई साथी न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई हमसफर न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई रोशनी न मिली..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई हमराज न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई ज्ञानी न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई दानी न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई हमजोली न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई मनचाहा न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;अब तक कोई मेरा न मिला..सिवाय किताब के&lt;br /&gt;                  ...कृष्णशंकर सोनाने&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-1879594520543047085?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/1879594520543047085/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2011/07/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1879594520543047085'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1879594520543047085'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='सिवाय किताब के'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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cursor:hand;width: 243px; height: 400px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-OshWAL2b9Kw/TdH3FUR11MI/AAAAAAAAAVI/0VZ7d0E3CS0/s400/Picture.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5607534681767924930" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;तुम सूर्य थे&lt;br /&gt;         ...राजेन्द्र शर्मा&lt;br /&gt;तुम सूर्य थे हमेशा&lt;br /&gt;मैं तुम्हारा चन्द्रमा&lt;br /&gt;उधार की रोशनी से चमकता हूं रोज़&lt;br /&gt;सूर्यास्त के बाद&lt;br /&gt;चांदनी रात में नौका विहार जैसे&lt;br /&gt;चुराये गये वाक्यों के सहारे&lt;br /&gt;एक स्कूली निबन्ध लिखता हूं&lt;br /&gt;और अब्बल नम्बर कहाता हूं&lt;br /&gt;तमगों से चिथड़ा हुई कमीज़&lt;br /&gt;शान से पहले घूमता हूं तुम्हारी आकाशगंगा में&lt;br /&gt;मेरे चेहरे पर तो तुम्हारी अक्कासी साफ साफ&lt;br /&gt;इतनी कि दूर से दिखाई दे&lt;br /&gt;किसी ने लाड़ से आंजी है काजल बी लकीर&lt;br /&gt;और लगा दिया हो डिठौना&lt;br /&gt;तुम्हारे पीछे पीछे  एक गोलार्द्ध से दूसरे गोलार्द्ध&lt;br /&gt;में जाता हूं&lt;br /&gt;तुम्हे धन्यवाद कहने के लिए&lt;br /&gt;बस एक छोटा सा शब्द&lt;br /&gt;जो कभी कहा नहीं&lt;br /&gt;सामना होने पर पीला पड़ जाता हूं&lt;br /&gt;कभी घटता हूं कभी बढ़ जाता हूं ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-1161809397952000506?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/1161809397952000506/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2011/05/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1161809397952000506'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1161809397952000506'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='स्मृति शेष----कमला प्रसाद'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-B7YyBtOkRag/TdH3Jyxp5xI/AAAAAAAAAVQ/oE1hziBKS5g/s72-c/Picture%2B001.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-842324452145491464</id><published>2011-04-08T22:52:00.000-07:00</published><updated>2011-04-08T22:53:01.225-07:00</updated><title type='text'>भ्रष्टाचार मिटाया नहीं जा सकता</title><content type='html'>जनलोकपाल बिल लाने के लिए 72 वर्षीय गांधीवादी अन्ना हजारे आमरण अनशन कर रहे हैं । उन्हें कोटी कोटी साधुवाद..इसलिए भी कि इतना साहस अन्ना ने किया है। हम भी अन्ना के साथ है,यदि भ्रष्टाचार वास्तव में मिटाना है,लेकिन मेरे चार दशक के अनुभव ने यह बताया है कि गांधीवादी अन्ना हजारे जैसे दस बीस अन्ना हजारे भी अनशन करके अपना बलिदान दे दें तो भी भारत जैसे देश के जनमानस के व्यवहार से भ्रष्टाचार मिटाया नहीं जा सकता । चाहे कितने भी जनलोकपाल बिल पास हो जाए । हमारे देश का एक अदने से व्यक्ति से लेकर उच्चस्तर पर विराजमान व्यक्ति पर आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त है । शासकीय अथवा अशासकीय संस्थानों में अन्तिम पंक्ति का कर्मचारी हो या प्रथम पंक्ति का अधिकारी हो,सीधे मुंह बात नहीं करता । किसी व्यक्ति का महत्वपूर्ण कार्य नहीं हो पाता,जब तक कि उन्हें उनकी मांग पूरी नहीं की जाती । यह कहना विश्वसनीय नहीं है कि जनलोकपाल बिल पास होने के बाद ऐसा नहीं होगा,क्योंकि हमारे देश के लोगों में भ्रष्ट आचरण उनकी रग रग में उनके रक्त में उनके विचारों में उनके व्यवहार में...यहां तक कि उनके आचार विचार में बसा हुआ है। मैं अन्ना जी ने करबद्ध अनुरोध करना चाहूंगा कि पहले जनमानस में नैतिक आचार विचार का बिजारोपण करे तत्पश्चात जनलोकपाल बिल पास करने के लिए कदम उठाए ।    मैं अपने ही देश के लोगों के भ्रष्ट आचार विचार और व्यवहार से त्रस्त हूं । किसी भी कार्यालय में जाता हूं तो कोई भी सीधे मुंह बात नहीं करता,कार्य भले ही न हो । मेरा हृदय दुखित है । लोक निर्माण विभाग का कर्मचारी बिना पैस लिए सरकार मकान का कार्य नहीं करता । ऐसे अनेकों उदाहरण पेश किए जा सकते है।        मेरा संदेश यह है कि अन्नाजी,आप यह कदम न उठाएं क्योंकि हमारे देश की भ्रष्ट जनता का आचरण  कभी गांधीवादी नहीं हो सकता । गांधीबाबा के आचरण पर चलना अब टेडी खीर है।                                                       ...कृष्णशंकर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-842324452145491464?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/842324452145491464/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2011/04/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/842324452145491464'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/842324452145491464'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='भ्रष्टाचार मिटाया नहीं जा सकता'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-1464545323161079922</id><published>2011-03-23T04:54:00.000-07:00</published><updated>2011-03-23T05:02:08.235-07:00</updated><title type='text'>कविताएं--कृष्णशंकर सोनाने</title><content type='html'>&lt;strong&gt;चांद&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मेरे जागने से लेकर&lt;br /&gt;सोने तक&lt;br /&gt;वह मुस्तैद रहता है&lt;br /&gt;मेरे साथ ।&lt;br /&gt;जब मैं&lt;br /&gt;सो रहा होता&lt;br /&gt;वह जागते रहता है&lt;br /&gt;जैसे पहरा दे रहा हो&lt;br /&gt;जब मैं&lt;br /&gt;चल रहा होता&lt;br /&gt;वह मेरे साथ-साथ चलने लगता है&lt;br /&gt;मेरे ठहरने पर&lt;br /&gt;वह भी ठहरता है&lt;br /&gt;मैं भले ही थोड़ा सुस्ता लूं&lt;br /&gt;वह बराबर सजग रहा करता है&lt;br /&gt;सुस्ताना उसने सीखा नहीं&lt;br /&gt;लेकिन जब मैं&lt;br /&gt;जाग जाता हूं&lt;br /&gt;वह सो जाता है&lt;br /&gt;जागने की तैयारी में&lt;br /&gt;क्योंकि उसे पता है&lt;br /&gt;मेरे सो जाने पर&lt;br /&gt;उसे पहरा देना होगा&lt;br /&gt;मुस्तैद होकर ।&lt;br /&gt;( दिनांक 21.09.2010)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चाहने पर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहने पर&lt;br /&gt;कभी चाहा हुआ नहीं होता&lt;br /&gt;अनचाहा हो जाता है।&lt;br /&gt;चाहने पर&lt;br /&gt;यदि चाहा हुआ हो जाय तो&lt;br /&gt;हम कहते हैं&lt;br /&gt;यह तो होना ही था&lt;br /&gt;इसलिए हो गया ।&lt;br /&gt;चाहने पर&lt;br /&gt;न तो रमा का अभिषेख हुआ&lt;br /&gt;न ही पाण्डवों को राज्य मिला ।&lt;br /&gt;चाहने पर&lt;br /&gt;कभी नहीं बन पाती कोई कविता&lt;br /&gt;कोई अच्छी सी कहानी&lt;br /&gt;कोई आख्यान ।&lt;br /&gt;चाहने पर&lt;br /&gt;कुछ होना होता तो हो जाता&lt;br /&gt;जैसे कोई राजनेता&lt;br /&gt;लुच्चा,लफंगा,चिढ़ीमार ।&lt;br /&gt;( नवम्बर,2010)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रेम करने के लिए&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेम करने के लिए&lt;br /&gt;एक प्रिय का होना जरूरी है&lt;br /&gt;जिसकी मांग में&lt;br /&gt;भरा जा सके सिन्दूर&lt;br /&gt;मेरी चुटकी में भरा सिन्दूर&lt;br /&gt;किस मांग में भरूं&lt;br /&gt;न मैं किसी का प्रिय हूं&lt;br /&gt;न कोई मेरा प्रिय बना&lt;br /&gt;मुझे तलाश है&lt;br /&gt;एक अदद प्रिय की ।&lt;br /&gt;( 31.12.2010)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जरूरत से ज्यादा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर लोगों की यह आकांक्षा रहती&lt;br /&gt;कि उनके पास यह भी होता तो&lt;br /&gt;कितना अच्छा होता,या&lt;br /&gt;वह भी होता तो कितना अच्छा होता&lt;br /&gt;इसे और उसे पाने की उनकी आकांक्षा&lt;br /&gt;कुलांचे माने लगती है,और&lt;br /&gt;उसे पाने के लिए&lt;br /&gt;जी जान से ज्यादा मेहनत करने लगते हैं&lt;br /&gt;और अन्तत: वे उसे पा ही लेते हैं&lt;br /&gt;हालांकि ऐसा नहीं कि&lt;br /&gt;उनके पास वह चीज पहले नहीं थी&lt;br /&gt;लेकिन उनकी आकांक्षा थी&lt;br /&gt;जो चीज उनके पास है&lt;br /&gt;वह बहुत कम है&lt;br /&gt;शायद उनकी जरूरत इससे ज्यादा की होगी&lt;br /&gt;और यह चीज जरूरत से ज्यादा है&lt;br /&gt;जरूरत से ज्यादा चीजें हवस को बढ़ावा देती है,और&lt;br /&gt;.यह हवस कभी पूरी नहीं होती&lt;br /&gt;.जरूरत से ज्यादा की हवस इन्सान को&lt;br /&gt;भीतर ही भीतर खोखला कर देती है ।&lt;br /&gt;.जरूरत से ज्यादा चीजें&lt;br /&gt;.जगह मांगती है&lt;br /&gt;और एक दिन ऐसा आएगा&lt;br /&gt;सारी धरती&lt;br /&gt;जरूरत से ज्यादा भर जाएगी ।&lt;br /&gt;( दिनांक 03.03.2011)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बस्ती के लोग&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलग-अलग धड़ों में बण्ट गए है&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग&lt;br /&gt;बैठ बारूद पर तिलियां जला रहे हैं&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग ।&lt;br /&gt;भाई-चारा भूल बैठे है&lt;br /&gt;नफरत की गांठ ऐंठ बैठे हैं&lt;br /&gt;अपने मुख में कड़वी ज़बान&lt;br /&gt;बरसों से लुकाए बैठे हैं&lt;br /&gt;अड़ौसी-पड़ौसी दुआ-सलाम&lt;br /&gt;भूल बैठे है मेरी बस्ती के लोग&lt;br /&gt;अलग-अलग धड़ों में बण्ट गए है&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग ।&lt;br /&gt;रिश्ते-नाते कड़वे हो गए&lt;br /&gt;अपने ही वाले भड़वे हो गए&lt;br /&gt;घर अपनों का जलते देख-देख&lt;br /&gt;बगले झाम्पते तड़वे हो गए&lt;br /&gt;अब तो मान मार्यादा भूल बैठे है&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग ।&lt;br /&gt;अलग-अलग धड़ों में बण्ट गए है&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग ।&lt;br /&gt;कौन किसी पर करें भरोसा&lt;br /&gt;पे्रम-प्याली में ज़हर परोसा&lt;br /&gt;आनन-फानन मेल मिलाप है&lt;br /&gt;फैला रखा है औपचारिकता का भूसा&lt;br /&gt;जिस माला में फूल गूंथे हो&lt;br /&gt;गोले-बारूद पिरो रहे है&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग ।&lt;br /&gt;अलग-अलग धड़ों में बण्ट गए है&lt;br /&gt;मेरी बस्ती के लोग ।&lt;br /&gt;( दि: 01.03.2011)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नास्टेल्जिया&lt;/strong&gt;      &lt;br /&gt;             &lt;br /&gt;तुलसी,जायसी और मीरा ने नहीं कहा,और&lt;br /&gt;न ही कबीर या मुक्तिबोध ने कहा&lt;br /&gt;बल्कि आप,हम सभी देख रहे हैं&lt;br /&gt;गांधी के तीनों बन्दर भी अञ्जान नहीं है&lt;br /&gt;लेकिन फिर भी&lt;br /&gt;अन्यमनस्क होकर निरपेक्ष भाव से&lt;br /&gt;टकटकी लगाए हुए है&lt;br /&gt;जो हो रहा है उसे&lt;br /&gt;महज़ साक्षी होकर तटस्थ है ।&lt;br /&gt;परिवर्तन चाहे हो या न हो&lt;br /&gt;लेकिन जो रोग घुन् बनकर लग चुका है&lt;br /&gt;वह भीतर तक खोखला कर रहा है&lt;br /&gt;विवश है गांधी और विवेकानन्द&lt;br /&gt;चाहकर भी बदल नहीं  पा रहे है मानसिकता&lt;br /&gt;कर्णधारों और ऊंचे पदों पर आसीन&lt;br /&gt;महामहिमों की ।&lt;br /&gt;भीतर तक पूर्वाग्रह से ग्रसित रोग&lt;br /&gt;इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ता&lt;br /&gt;जब तक कि हम स्वयं अपनी इच्छाशक्ति को&lt;br /&gt;दृढ़ बनाने का संकल्प नहीं लेते ।&lt;br /&gt;समूची मानवता ताक रही है&lt;br /&gt;उस ओर&lt;br /&gt;जहां से उसे पूरी उम्मीद है कि&lt;br /&gt;एक न एक दिन&lt;br /&gt;इस महारोग से मुक्ति मिल जाएगी&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;समरसता की जड़ों में कोपलें फूटेगी&lt;br /&gt;वसुन्धरा हरी-भरी हो जाएगी&lt;br /&gt;मुक्तिबोध एक बार फिर मुस्कराएंगे&lt;br /&gt;कहेंगे&lt;br /&gt;घुन् लगे इस रोग को सींचों मत&lt;br /&gt;इसे समूल नष्ट कर दो&lt;br /&gt;कि लहलहाएं मानवता&lt;br /&gt;चाहे कितनी भी संकटापन्न स्थिति हो&lt;br /&gt;कोई तो इलाज होगा&lt;br /&gt;इस बीमारी का ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अतिरिक्त&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ महामहिमों के नामों का उल्लेख मिलता है,जो महिमा-मण्डित थे&lt;br /&gt;बाकी सब अतिरिक्त थे ।&lt;br /&gt;अतिरिक्त बहुसंख्यक होते थे&lt;br /&gt;दुनिया के सारे कामधाम करने के बाद&lt;br /&gt;महामहिमों के गोिष्ठयों में शामिल होते थे&lt;br /&gt;उनके भाषणों पर वाह-वाह कर तालियां बजाते&lt;br /&gt;प्रफुिल्लत होते और एकमत होते थे&lt;br /&gt;अतिरिक्तों को ऐसे भ्रम में डाल दिया जाता था कि&lt;br /&gt;उनके बिना महामहिमों का महिमा-मण्डित होना सम्भव नहीं &lt;br /&gt;अतिरिक्त हमेशा ही गोिष्ठयों में शामिल होते थे&lt;br /&gt;इसलिए वे अक्सर महामहिमों के शिकार होते थे।&lt;br /&gt;वे महामहिमों की नज़रों से वंचित कर दिए जाते थे&lt;br /&gt;हाशिए पर डाल कर नज़र-अन्दाज कर दिए जाते थे &lt;br /&gt;अतिरिक्त किसी भी जोखिम से नहीं डरते थे&lt;br /&gt;महामहिम उन्हें बरगालाने से पीछे नहीं हटते थे&lt;br /&gt;वे जताते थे कि अतिरिक्तों के बिना उनका काम चलनेवाला नहीं है&lt;br /&gt;और अतिरिक्त वे सारे काम करते थे&lt;br /&gt;जिनसे महामहिमों की महिमा-मण्डित की बने रहने की पोजिशन बची रहे&lt;br /&gt;अतिरिक्त जानते हैं कि अतिरिक्तों के बिना महामहिमों के सिर पर&lt;br /&gt;महिमा-मण्डित के पद से गिरने का खतरा बना रहता है ।&lt;br /&gt;अतिरिक्त हर सभा-गोिष्ठयों में शामिल होते थे&lt;br /&gt;अतिरिक्त ज्यादातर सिरफिरे महामहिमों की गोिष्ठयों में&lt;br /&gt;बतौर अतिरिक्त नज़र आते रहते थे&lt;br /&gt;अतिरिक्तों को उखाड़ फेकने में महामहिमों भूमिका&lt;br /&gt;बरकरार बनी रहती है।&lt;br /&gt;(2)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतिरिक्त के बग़ैर&lt;br /&gt;किसी सभा-गोष्ठी की शोभा&lt;br /&gt;नहीं ही होती है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह वो अतिरिक्त है&lt;br /&gt;जो सफलता की गैरण्टी है&lt;br /&gt;मसलन,अतिरिक्तों की उपस्थिति का मतलब&lt;br /&gt;सभा-गोिष्ठयों की सफलता&lt;br /&gt;अतिरिक्तों के बग़ैर&lt;br /&gt;सफल होते नहीं देखी गई&lt;br /&gt;सभा-गोष्ठियां ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये जो अतिरिक्त है&lt;br /&gt;समझते हैं कि इनके बिना&lt;br /&gt;सभा-गोष्ठियों की रंगत&lt;br /&gt;नहीं ही बढ़ सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुलाए, बिना बुलाए अतिरिक्त की पूरी फौज&lt;br /&gt;हर सभा-गोष्ठी में&lt;br /&gt;देखी जा सकती है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भले ही छोड़ना पड़े चाहे जितने जरूरी &lt;br /&gt;घरेलू-पारिवारिक कार्य&lt;br /&gt;महामहिमों की सभा-गोष्ठियों में शामिल होना&lt;br /&gt;वे अपना कर्तव्य समझते थे&lt;br /&gt;सम्भवत: अतिरिक्तों को अतिरिक्तों की श्रेणी में &lt;br /&gt;आता ही होगा आनन्द ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतिरिक्त,अतिरिक्त ही कहलाते थे&lt;br /&gt;बाकी जो होते थे महामहिमों की श्रेणी में आते थे&lt;br /&gt;अतिरिक्तों के बिना इनका&lt;br /&gt;महामहिम होना भी कठिन ही था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जो अतिरिक्त है&lt;br /&gt;जनभागीदारी की तरह&lt;br /&gt;अतिरिक्तों की भागीदारी का विकल्प होते थे&lt;br /&gt;जनभागीदारी में&lt;br /&gt;जन की भागीदारी की गैरण्टी होती ही है&lt;br /&gt;कोई जरूरी नहीं अतिरिक्तों की अतिरिक्त-भागीदारी&lt;br /&gt;अतिरिक्तों को ठीक उसी तरह अतिरिक्त माना जाता है&lt;br /&gt;जिस तरह वे अतिरिक्त है,अतिरिक्त की बनें रहें&lt;br /&gt;सारी सफलता के तमगें&lt;br /&gt;महामहिमों के कान्धों पर चस्पा हो जाते थे,और&lt;br /&gt;अतिरिक्तों को अतिरिक्त ही रहने दिया जाता था&lt;br /&gt;अन्यथा किसी दिन अतिरिक्त महामहिम बन जाएंगे&lt;br /&gt;और अतिरिक्त के बजाय महामहिम कहलाएंगे&lt;br /&gt;महामहिम नहीं चाहते थे कि कोई अतिरिक्त &lt;br /&gt;महामहिम बनकर उनकी बगल में विराजमान हो जाएं&lt;br /&gt;अतिरिक्तों को ऐसा सौभाग्य कभी नहीं मिलता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतिरिक्त अन्तत: अतिरिक्त ही बने रहते थे&lt;br /&gt;महामहिमों के कान्धे दमकते रहते थे तमगों से ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतिरिक्त,रजतपट के एक्स्ट्रा की तरह&lt;br /&gt;ताजिन्दगी अतिरिक्त की बनें रहते हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(दिनांक: 22 मार्च 2011 मंगलवार )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-1464545323161079922?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/1464545323161079922/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2011/03/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1464545323161079922'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1464545323161079922'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='कविताएं--कृष्णशंकर सोनाने'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-823212489929081752</id><published>2010-06-17T10:14:00.000-07:00</published><updated>2010-06-17T10:16:20.129-07:00</updated><title type='text'>एक अच्छा इन्सान</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;पूर्वाग्रह से ग्रसित कौन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       अक्सर यह अनुभव में आया है कि जब किसी से विचार नहीं मिले तो माना जाता है कि वह पूर्वाग्रह से ग्रसित है । पूर्वाग्रह से कोई भी ग्रसित हो सकता है । चाहे विचार मिले ना मिले । यह भी जरूरी नहीं कि जो पूर्वाग्रह से ग्रसित है,वह अच्छा व्यक्ति है भी या नहीं । अच्छे से अच्छा व्यक्ति पूर्वाग्रह से ग्रसित पाया जाता है । चाहे वह आपके हमारे विचारों से सहमत हो या न हो । लेकिन इधर उन बुद्धिजीवियों को पुर्वाग्रह से ग्रसित पाया गया,जो परिवार,समाज,देश में ही नहीं बल्कि देश के बाहर भी प्रसिद्ध है । जो ऐसा कार्य करते है,जिनके जिन्दा रहने या न रहने पर भी इतिहास लिख लेते है । इनमें प्रमुख है साहित्यकार । जी हां,साहित्यकार । साहित्यकार सबसे ज्यादा पूर्वाग्रह से ग्रसित पाया जाता है । वह अपने को ठीक उसी तरह समेटना चाहता है जिस तरह कछुआ स्वयं को समेट लेता है । वह केवल अपनी बिरादरी में ही सिमट कर रह जाता है । वह अपने और अपने बिरादरी के अलावा किसी अन्य को कुछ भी नहीं समझता या नहीं मानता । यह जरूरी नहीं कि एक अच्छा साहित्यकार एक अच्छा इन्सान हो और यह भी जरूरी नहीं कि एक अच्छा इन्सान एक अच्छा साहित्यकार हो । साहित्यकार होना या इन्सान होना,दोनों अलग अलग मायने रखता है किन्तु एक अच्छे साहित्यकार को सबसे पहले एक अच्छा इन्सान होना जरूरी है । 99.99 प्रतिशत साहित्यकार अच्छे इन्सान नहीं होते बल्कि मात्र 0.01 प्रतिशत साहित्यकार अच्छे इन्सान देखने में आए है ।&lt;br /&gt;                 मेरे अनुभव में व्यक्तिगततौर पर स्व.हरिवंशराय बच्चन,स्व.विष्णुप्रभाकर,सर्वश्री चन्द्रकान्त देवताले,प्रो कमला प्रसाद,पूर्णचन्द्र रथ,राजेन्द्र शर्मा,अक्षय कुमार जैन ]विजय बहादुर सिंह जैसे साहित्यकार बहुत अच्छे व्यक्ति होना पाए गए है । ऐसा नहीं कि अन्य साहित्यकारों से मैं असहमत हूं बल्कि मुझे ऐसा लगता है अन्य साहित्यकार बन्धु मेरे विचारों से सहमत नहीं है ।&lt;br /&gt;                 प्रो.कमला प्रसाद कहते हैं कि केवल विचारों की असहमति के ही कारण साहित्यकार खेमों में और व्यक्तिगततौर पर बंटे है ।&lt;br /&gt;                वस्तु विचारों की असहमति के कारण ही हमारे देश में अनेकों साहित्यिक खेंमें बने है और अनेक विचारवादी पैदा हुए है । कहीं सहमति तो कहीं असहमति का माहौल बना हुआ है ।&lt;br /&gt;              बावजूद इसके साहित्यकारों में खेमों के अलावा भी व्यक्तिगत दुराग्रह पूर्वाग्रह का रोग लगा हुआ है । जैसे मेरे अनुभव में आया है कि साहित्यकार अपने विचारधारा के साहित्यकार के अलावा अन्य किसी से कोई व्यवहार नहीं रखता । न तो वह पत्र का जवाब देता है और न अपनी ओर से चर्चा के लिए पहल करता है ।&lt;br /&gt;            ऐसे कई साहित्यकार है जो मेरे पत्रों या ईमेल या एस एम एस का जवाब देना पसन्द ही नहीं करत । इनमें ज्यादातर सम्पादकगण भी शामिल है ।&lt;br /&gt;            आश्चर्य तो यहां तक होता है कि जब कभी ये साहित्यकार या सम्पादक महोदय से आमना सामना हो जाए तो बड़ी आसानी से मुंह मोड लेते है या ऐसा दिखावा करते है जैसे वे हमें जानते ही नहीं ।&lt;br /&gt;           भोपाल में ही ऐसे साहित्यकार और सम्पादक गण है जो राष्टीयस्तर पर प्रसिद्ध है और जब कभी उनसे आमना सामना होता है तो ऐसा व्यवहार करते है जैसे वे हमें जानते ही नहीं है । मैं  उनका नाम लेना नहीं चाहूंगा किन्तु वे स्वयं इसे पढ़कर समझ जाएंगे ।&lt;br /&gt;                  तो बन्धुओं , तआज्जुब की बात नहीं होने चाहिए क्योंकि जब तक साहित्यकार अच्छा इन्सान नहीं होता,वह साहित्यकार तो कहलाएगा ही किन्तु एक अच्छा इन्सान जाना नहीं जाएगा ।&lt;br /&gt;                एक बहुत बड़े आई ए एस अधिकारी का पिछले दिनों इन्तकाल हुआ । हालांकि वह अधिकारी एक साहित्यकार थे किन्तु वे एक बहुत खूंसट और बदमिजाज इन्सान भी थे । उन्हें अच्छे साहित्यकार के नाम से जाना तो जाएगा किन्तु एक बदमिजाज और खूंसट अधिकारी की छवि बरकरार रहेगी ।&lt;br /&gt;              इसलिए एक अच्छा साहित्यकार होना जितना जरूरी है उससे कहीं ज्यादा जरूरी है एक अच्छा इन्सान होना । &lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-823212489929081752?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/823212489929081752/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/06/blog-post_17.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/823212489929081752'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/823212489929081752'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/06/blog-post_17.html' title='एक अच्छा इन्सान'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-1282997397379315023</id><published>2010-06-14T09:28:00.000-07:00</published><updated>2010-06-18T04:19:16.504-07:00</updated><title type='text'>आज़ादी की पड़ताल</title><content type='html'>(1)&lt;br /&gt;मैं नशे में नहीं हूं&lt;br /&gt;और न ही उलजलूल बक-बक कर रहा हूं&lt;br /&gt;नशे के ऊपर और नशा&lt;br /&gt;और नशे के भीतर और नशा&lt;br /&gt;मेरे सिर पर सवार होने का&lt;br /&gt;सवाल ही उपस्थित नहीं होता ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नशे के भीतर या बाहर के&lt;br /&gt;बीच का जो अन्तराल है&lt;br /&gt;जाने कब का फुर्र हो चुका है&lt;br /&gt;तो श्रीमान जी&lt;br /&gt;इसे बाकायदा नशे के बाहर का&lt;br /&gt;एक तरह का नशा भी कह सकते हैं&lt;br /&gt;जिसका उस वाले नशे से &lt;br /&gt;कोई लेना देना नहीं है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जो नशा है,वह&lt;br /&gt;बस इतना सा ही है जितना&lt;br /&gt;आप मेरी कविता सुनते वक्त&lt;br /&gt;महसूस कर सकते हैं&lt;br /&gt;ये वो नशा है,जिसे&lt;br /&gt;अमीर,गरीब,फकीर,साधु&lt;br /&gt;और देश काल के भीतर रहनेवाले&lt;br /&gt;महसूस कर सकते हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देशकाल को जाने बिना&lt;br /&gt;भला यह नशा उतर कैसे सकता है ।&lt;br /&gt;तो श्रीमानो ! मेरा यह नशा भी बरकरार रहने दो ।&lt;br /&gt;तब ही तो बता पाऊंगा मैं&lt;br /&gt;उसके सीने में उठती कसक&lt;br /&gt;और आंखों से झरते आंसू&lt;br /&gt;अंधेरों में तपते जिस्म&lt;br /&gt;आन्तों में पड़ती मरोड़ें&lt;br /&gt;मां के सीने का सूखता दूध&lt;br /&gt;और तिज़ोरी में खनकते जवाहरात ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह नशा बरकरार रहने दो उतना&lt;br /&gt;जितने से अंगूर की बेटी नाचने लग जाए &lt;br /&gt;छमाछम ।।&lt;br /&gt;(2)&lt;br /&gt;आज़ादी और मेरे बीच&lt;br /&gt;जो फासला है&lt;br /&gt;वह महज़ पांच साल की उम्र का है&lt;br /&gt;यानि कि मैं आज़ादी से&lt;br /&gt;पांच बरस की उम्र में छोटा हूं&lt;br /&gt;पांच बरस की उम्र के पाट को&lt;br /&gt;पाटना मेरे लिए आसान तो क्या&lt;br /&gt;बहुत ही कठिन है।&lt;br /&gt;यदि मैं आज़ादी के साथ पैदा हुआ होता&lt;br /&gt;तो मेरे ठाट-बाट कुछ और ही होते &lt;br /&gt;जिसे देख आप लोगों की आंखे चौंधिया जाती ।&lt;br /&gt;एक सौ तीस करोड़ की आबादी में&lt;br /&gt;बुद्धिजीवी,पण्डित,मौला,फादर&lt;br /&gt;राजनेता,अभिनेता,कलाकार&lt;br /&gt;और मेरे प्रिय कवि चन्द्रकान्त देवताले&lt;br /&gt;सारे के सारे यही कहते&lt;br /&gt;तुम्हें आज़ादी के साथ पैदा होना था&lt;br /&gt;होते तो तुम आज&lt;br /&gt;आखिरी नहीं पहली पंक्ति में बैठे नज़र आते ।&lt;br /&gt;(3)&lt;br /&gt;समूचे भारत में&lt;br /&gt;कई वर्ग के लोग रहते चले आ रहे हैं&lt;br /&gt;जो हिन्दुस्तानी है वे हिन्द की सन्तान है&lt;br /&gt;और जो भारतीय है,वे भरत के वंशज है&lt;br /&gt;लेकिन जो इण्डियन है&lt;br /&gt;वे न तो हिन्दुस्तानी है और न ही भारतीय&lt;br /&gt;वे इण्डी के अयन है&lt;br /&gt;अयन के तात्पर्य से आप भलिभांति परिचित होंगे&lt;br /&gt;हाथ जला देते हैं ये,और&lt;br /&gt;अक्सर धीमे ज़हर के समान असरदार होते हैं &lt;br /&gt;ये जो इण्डियन है&lt;br /&gt;आज़ादी के साथ पैदा होते ही&lt;br /&gt;आज़ाद इण्डियन कहलाएं जाते हैं और&lt;br /&gt;तब से आज तक वे बरोबर आज़ाद ही है।&lt;br /&gt;इन्ही की करतूतों से&lt;br /&gt;हालात-ए-मुल्क मुश्किलात में हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब से विश्व-ग्राम बना है&lt;br /&gt;हिन्दुस्तानी और भारतीय सिकुड़ गए है,और&lt;br /&gt;इण्डियन्स का विस्तार होता चला जा रहा है&lt;br /&gt;नवउदारवाद और नव-उवनिवेशवाद की जड़ें&lt;br /&gt;हिन्दुस्तान और भारत को चट कर&lt;br /&gt;इण्डिया को फला-फूला रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दुस्तानी और भारतीय&lt;br /&gt;आज़ादी के पहले भी गुलाम थे&lt;br /&gt;आज़ादी के बाद भी गुलाम है&lt;br /&gt;इन गुलामों में मैं भी एक गुलाम हूं&lt;br /&gt;आज़ादी के साथ पैदा न होने का ग़म&lt;br /&gt;मुझे आज तक साल रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(4)&lt;br /&gt;उस रोज़ कॉफी हाउस के बाहर &lt;br /&gt;चिथड़ों में लिपटा,गालों से पिचका&lt;br /&gt;पीठ से लगी पीठ,आधे से ज्यादा झुका&lt;br /&gt;बत्तीसी उधड़ी,आंखें घंसी&lt;br /&gt;उलझे बालों में&lt;br /&gt;हाथ पसारे दयनीय याचना में करबद्ध&lt;br /&gt;लोकतन्त्र थर्र-थर्र कांपते गिड़गिड़ाते रहा था।&lt;br /&gt;किसी ने उसके पसरे हाथों पर&lt;br /&gt;दयारूपी भीख नहीं रखी&lt;br /&gt;बल्कि हुआ यह है कि&lt;br /&gt;धकियाते हुए उसे&lt;br /&gt;फर्राटे से अपनी एम्पाला ले उड़े&lt;br /&gt;पास ही सीट पर बैठा बुलडॉग&lt;br /&gt;भौंकता रहा लोकतन्त्र पर&lt;br /&gt;अपनी पूरी बत्तिसी निकाले हुए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुमने देखा होगा चन्द्रभान राही&lt;br /&gt;और आपने भी देखा होगा नरेन्द्र गौड़जी&lt;br /&gt;लोकतन्त्र कुत्ते के जबड़ें में&lt;br /&gt;इस तरह जकड़ा था&lt;br /&gt;मानो वह लोकतन्त्र नहीं&lt;br /&gt;हड्डी का स्वाददार टुकड़ा हो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा यह कहना होगा कि&lt;br /&gt;जो आज़ादी के साथ पैदा हुए&lt;br /&gt;असल में वे ही सर्वशक्तिमान कहलाए&lt;br /&gt;उन्हें इतनी आज़ादी मिल गई कि&lt;br /&gt;संविधान की धज्जियां उड़ाने में&lt;br /&gt;हासिल हो गई है महारत &lt;br /&gt;चाहे जिसे खरीदो,चाहे जिसे बेचो&lt;br /&gt;बाकायदा लायसेन्सधारी है ये सब&lt;br /&gt;वे आज़ादी से सीना ताने&lt;br /&gt;चाहे जिसे घकिया सकते&lt;br /&gt;बल्कि बीच बाज़ार खड़े होकर&lt;br /&gt;उतार सकते मौत के घाट चाहे जिसे &lt;br /&gt;हम और आप देखते रह जाएंगे&lt;br /&gt;मेरे प्रिय मित्र प्रतापराव कदम&lt;br /&gt;और आप कुछ भी नहीं कर पाएंगे&lt;br /&gt;नवल शुक्ल जी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(5)  &lt;br /&gt;इतना तो सच है कि&lt;br /&gt;जब गांधी बाबा ने स्वराज का&lt;br /&gt;नारा बुलन्द किया था&lt;br /&gt;तब भी उनकी अहमियत सारा देश जानता था&lt;br /&gt;और आज जब&lt;br /&gt;हमारे बीच गांधी बाबा नहीं है&lt;br /&gt;अब भी सारा हिन्दुस्तान&lt;br /&gt;गांधी बाबा की अहमियत को बरकरार रखे हुए हैं&lt;br /&gt;एक कदम भी चल नहीं पा रहे हैं&lt;br /&gt;जहां कहीं या हर कहीं&lt;br /&gt;गांधी बाबा का दामन पकड़े &lt;br /&gt;आप,वह और हम सब&lt;br /&gt;पार नहीं पा सकते किसी परेशानी के&lt;br /&gt;गांधीबाबा का मुखड़ा देखते ही&lt;br /&gt;अच्छे खासे शख्स के या&lt;br /&gt;कू्ररतम से क्रूरतम आदमी के&lt;br /&gt;चेहरे दमकने लग जाते हैं&lt;br /&gt;आखिर क्यों न हो&lt;br /&gt;एक गांधी बाबा ही है जिनके दम पर&lt;br /&gt;सारा हिन्दुस्तान &lt;br /&gt;एक दो कदम नहीं बल्कि&lt;br /&gt;हज़ार-हज़ार कदम एक साथ चल देता है&lt;br /&gt;या इसे यों कह सकते हैं&lt;br /&gt;गांधीबाबा के दम पर&lt;br /&gt;देश के किसी भी भले आदमी का ईमान&lt;br /&gt;खरीदा जा सकता है बिल्कुल सस्ते दामों  पर ।&lt;br /&gt;आप,आप और आपने शायद&lt;br /&gt;गांधी बाबा के श्रीमुख पर हमेशा मधुर मुस्कान देखी हो&lt;br /&gt;यह वो ही मुस्कान है&lt;br /&gt;जिसके देखते ही रोते हुए चेहरे पर पानी आ जाता है&lt;br /&gt;रिश्तों के बीच टूटती दीवार&lt;br /&gt;या तो हरहराकर टूट जाती है या&lt;br /&gt;टूटते-टूटते बच जाया करती है ।&lt;br /&gt;गांधी बाबा की वह मधुर मुस्कान एक जादू है&lt;br /&gt;इस जादू को आप नहीं समझ पाएंगे भगवत रावतजी&lt;br /&gt;इस मुस्कान को वे ही समझ सकते हैं&lt;br /&gt;जिनको गांधी बाबा  के बिना चैन नहीं आता&lt;br /&gt;उड़ जाती है नीन्द आंखों की&lt;br /&gt;एक और खास बात है&lt;br /&gt;जिनके पास गांधी बाबा है उनकी भी और&lt;br /&gt;जिनके पास गांधी बाबा नहीं है उनकी भी&lt;br /&gt;नीन्द उड़ी-उड़ी रहती है &lt;br /&gt;जितना ज्यादा गांधी बाबा को चाहोगे&lt;br /&gt;उतनी ही हवस बढ़ती जाएगी&lt;br /&gt;गांधी बाबा की हवस इतनी बढ़ जाती है कि&lt;br /&gt;आदमी को उचित-अनुचित कुछ नहीं सुझता ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो भाइयों और साहिबानों !&lt;br /&gt;आपमें यदि कूवत है&lt;br /&gt;गांधी बाबा को हज़म करने की&lt;br /&gt;तो मैं आपको सलाह देना चाहूंगा कि&lt;br /&gt;जितने गांधी बाबा आते रहे&lt;br /&gt;उन्हें आने ही आने दो&lt;br /&gt;जब तक वे चाहे उन्हें आने ही दो,और&lt;br /&gt;बिना डकार लिए हज़म करते जाओ ।&lt;br /&gt;जब नेता,राजनेता,नौकरशाह&lt;br /&gt;और नीचले ऊपरवाले लोग-बाग&lt;br /&gt;फाइलों में ही योजनाएं और परियोजनाएं&lt;br /&gt;बनाते रहते हैं&lt;br /&gt;पुल-पुलिया,सड़क,बांध,भवन&lt;br /&gt;तन्त्र-यन्त्र मन्त्र सब डकारते जाते रहते हैं&lt;br /&gt;तब भी गांधी बाबा उन्हें देख-देख&lt;br /&gt;मद्धम-मद्धम मुस्कराते रहते हैं&lt;br /&gt;मानो जतला रहे हो कि&lt;br /&gt;भैयन ! तुम सारे काले-करतूतों को&lt;br /&gt;सरेअंजाम देते रहे,मैं&lt;br /&gt;मैं तुम्हें देख-देख मुस्काते रहूंगा ।&lt;br /&gt;1948 के बाद से गांधी बाबा &lt;br /&gt;देश भक्तों की काली-करतूतों को&lt;br /&gt;देख-देख बराबर मुस्करा रहे हैं&lt;br /&gt;और उनकी तिजोरियों में&lt;br /&gt;बड़े इत्मिनान से आराम फरमा रहे हैं ।&lt;br /&gt;(6)&lt;br /&gt;उस रोज़&lt;br /&gt;न्यू मार्केट के हृदय स्थल पर स्थित&lt;br /&gt;टॉप-एन-टाउन के चौराहे पर&lt;br /&gt;कॉफी हाउस के मुंहाने पर&lt;br /&gt;बहुत चहल-पहल हो रही थी&lt;br /&gt;स्कूल-कॉलेज और भले घरों के लड़के-लड़कियां&lt;br /&gt;आदमी-औरत,युवक-युवतियां&lt;br /&gt;जवान - वृद्ध और&lt;br /&gt;तरह -तरह के लोग-बाग&lt;br /&gt;हसीन और जवान शाम का&lt;br /&gt;लुत्फ उठा रहे थे &lt;br /&gt;एक दूसरे की बगलें झांक रहे थे&lt;br /&gt;गलबईयों का दौर चल रहा था&lt;br /&gt;और जिन्दगी पहले से कहीं ज्यादा&lt;br /&gt;चल रही थी तेज-फर्राटेदार&lt;br /&gt;की जा रही थी जिन्दगी को &lt;br /&gt;सफल बनाने की पूरी कोशिश&lt;br /&gt;कोई भी इन्सान ऐसे वक्त को&lt;br /&gt;अपने हाथों से फिसल देना नहीं चाह रहा था&lt;br /&gt;जैसे फिसल जाती है बन्द मुट्ठी से रेत&lt;br /&gt;और रह जाते हाथ रिते के रिते... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई भी भूखा-प्यासा दिख नहीं रहा था&lt;br /&gt;सारे के सारे खा-पी के अघा रहे थे&lt;br /&gt;इतना ही नहीं बड़े मज़े ले-लेकर&lt;br /&gt;दिखा रहे थे ठेंगा&lt;br /&gt;भारत के भाल पर &lt;br /&gt;ठोक रहे थे पेंगा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक सौ तीस करोड़ आबादी में से&lt;br /&gt;तीस करोड़ प्रजातन्त्र&lt;br /&gt;जी रहे कीड़े-मकोड़ों की तरह&lt;br /&gt;घुटनों में मुंह छुपाएं&lt;br /&gt;कांपती हुई ठण्ड&lt;br /&gt;तपाती हुई वैशाखी धूप,और&lt;br /&gt;झुलसती हुई रातों में ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना तो सच है&lt;br /&gt;मेरे प्रिय कवि राजेश जोशी जी &lt;br /&gt;कि तन्त्र के मुंह में लग चुका है&lt;br /&gt;प्रजा का ताज़ा-ताज़ा गर्म&lt;br /&gt;स्वादिष्ट रक्त&lt;br /&gt;उसकी डाढों में बिलख रहा है&lt;br /&gt;हाडमांस का कमजोर प्रजातन्त्र ।&lt;br /&gt;00&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-1282997397379315023?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/1282997397379315023/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/06/blog-post_14.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1282997397379315023'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1282997397379315023'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/06/blog-post_14.html' title='आज़ादी की पड़ताल'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-1434872204552505460</id><published>2010-04-04T05:02:00.001-07:00</published><updated>2010-04-04T05:02:26.195-07:00</updated><title type='text'>कविता</title><content type='html'>कविता &lt;br /&gt;वृद्ध अनाथ हो रहे हैं&lt;br /&gt;आसमान की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं वृद्ध&lt;br /&gt;वृद्ध कुलबुला रहे है&lt;br /&gt;कुलबुला रहे हैं वृद्ध&lt;br /&gt;सबसे भयानक विडम्बना है यह हमारे समय की&lt;br /&gt;हल करने के लिए किया जाना चाहिए&lt;br /&gt;इसे प्रश्न पत्र में शामिल&lt;br /&gt;अनिवार्य प्रश्नों के समूह मे&lt;br /&gt;वृद्धाश्रम क्यों भेजे जा रहे हैं&lt;br /&gt;क्या संतानहीन है सारे वृद्ध&lt;br /&gt;कम हो गई होगी जगह संतानों के दिलों में&lt;br /&gt;घरों में चाहे कितनी ही जगहें हो&lt;br /&gt;आसमान में तारा टूटा होगा और&lt;br /&gt;वह कहीं ऐसी जगह गिरा होगा&lt;br /&gt;अस्तित्व जहां उसका कुछ होगा ही नहीं&lt;br /&gt;टकटकी लगाए देखना&lt;br /&gt;इस उम्मीद के साथ कि&lt;br /&gt;किन्ही हाथों का सहारा मिल जाए।&lt;br /&gt;तिल का ताड़ बनाना इतना आसान नहीं है&lt;br /&gt;जितना आसान दुरदुराना होता है&lt;br /&gt;क्या संवेदनाएं रफूचक्कर हो गई है&lt;br /&gt;क्या कर्त्तव्यविमूख हो गया है हमारा समय&lt;br /&gt;या सारी पृथ्वी को कर दिया गया है खारिज।&lt;br /&gt;कुलबुलाना नियति बन गई है।&lt;br /&gt;वृद्ध कुलबुला रहे हैं.....क्यों&lt;br /&gt;कब तक कुलबुलाते रहेंगे&lt;br /&gt;कुलबुला रहे हैं आसामान की ओर ताकते हुए&lt;br /&gt;वृद्ध कुलबुला रहे है।&lt;br /&gt;--.कृष्णशंकर सोनाने&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;खत्म हो गए हैं&lt;br /&gt;खत्म हो गए है&lt;br /&gt;आदर्श और मानवता के सारे सिद्धान्त&lt;br /&gt;समानता की बातें करना&lt;br /&gt;बीती सदी की बासी खरोंचन हो गई है&lt;br /&gt;अहिंसा के कंटीलें पथ पर चलकर&lt;br /&gt;आज तक किसी का कल्याण हो नहीं सका&lt;br /&gt;बलि के बकरे का&lt;br /&gt;बलिदान हो जाने पर भी&lt;br /&gt;खानेवाले को स्वाद नहीं आता&lt;br /&gt;सत्य अहिंसा के पथ पर चलकर&lt;br /&gt;सीने पर गोली खाने के बाद&lt;br /&gt;झोंकी जा रही है जनता&lt;br /&gt;भढ़भूंजे की भट्टी में&lt;br /&gt;इसीलिए&lt;br /&gt;यह जरूरी नहीं है कि&lt;br /&gt;वे और उनकी संतानें&lt;br /&gt;राज़ करें देश पर।&lt;br /&gt;सीने पर गोली खाने&lt;br /&gt;हम ही क्यों आगे आए&lt;br /&gt;जो सबसे अधिक बेईमान है&lt;br /&gt;और सबसे अधिक क्रर है&lt;br /&gt;जो षढ़यंत्र की साजिश&lt;br /&gt;रचने में माहिर है&lt;br /&gt;वे ही मार्गदर्शन कर रहे हैं&lt;br /&gt;ले चल रहे हैं प्रकाश से अंधकार की ओर।&lt;br /&gt;--.कृष्णशंकर सोनाने&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;भरी दोपहरी&lt;br /&gt;नहा रही वह गंगा जी के तट पर&lt;br /&gt;देह गदराई&lt;br /&gt;दमक रही है यौवनता के पथ पर ।।&lt;br /&gt;दिख रही है&lt;br /&gt;देह कंचन उघड़ी उघड़ी यहां वहां से&lt;br /&gt;देख रही है&lt;br /&gt;निगाहें सैंकड़ों छुपके छिपके जाने कहां से।&lt;br /&gt;कैसी निर्लज्जता&lt;br /&gt;बिखरी पड़ी है होटलों रेस्तरां रजत पट पर&lt;br /&gt;देह गदराई&lt;br /&gt;दमक रही है यौवनता के पथ पर ।।&lt;br /&gt;उघड़ रही है&lt;br /&gt;काया कंचन मेले और चौबारों में&lt;br /&gt;शीत वर्षा&lt;br /&gt;तपते चैत वह इतनाये बाज़ारों में ।&lt;br /&gt;इठलाती मदमाती&lt;br /&gt;वह कमर लचकाती चल पड़ी अब रैंप पर&lt;br /&gt;देह गदरायी&lt;br /&gt;दमक रही है यौवना के पथ पर ।।&lt;br /&gt;अंग अंग मादकता&lt;br /&gt;तिस पर रसभरे अधरों के प्याले&lt;br /&gt;मात पिता भ्राता&lt;br /&gt;भगिनी के मुख पर लगे आधुनिकता के ताले।&lt;br /&gt;निकल पड़ी वह&lt;br /&gt;सदी इक्कीसवीं के सुनहरे स्वप्निल पथ पर&lt;br /&gt;जाने किधर वह&lt;br /&gt;चली जा रही सभ्यता संस्कृति तज कर&lt;br /&gt;देह गदरायी&lt;br /&gt;दमक रही है यौवनता के पथ पर ।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;मैं कविता रचता हूं&lt;br /&gt;रचता क्या हूं&lt;br /&gt;प्रियतमाओं के मुखड़े निहारता हूं&lt;br /&gt;और पत्थरों से सिर टकराता हूं ।&lt;br /&gt;मैं कविता रचता हूं&lt;br /&gt;फूलों का रस और रसों की सुगन्ध&lt;br /&gt;इस तरह चुरा लेता हूं&lt;br /&gt;जिस तरह किसी के आंख का काजल&lt;br /&gt;कोई चुरा लेता है।&lt;br /&gt;मैं रचता हूं कविता&lt;br /&gt;और चुपचाप&lt;br /&gt;गिन लेता हूं पंख&lt;br /&gt;उड़ती चिड़िया के&lt;br /&gt;कितने पर है उसकी उड़ान ।&lt;br /&gt;मैं कविता रचता हूं&lt;br /&gt;किशोरीलाल की झोपड़ी में बैठे&lt;br /&gt;और रांधता हूं&lt;br /&gt;बच्चों को खुश करने के लिए गारगोटियों की सब्जी ।&lt;br /&gt;मैं रचता हूं कविता&lt;br /&gt;तसलीमा नसरीन की&lt;br /&gt;आंखों के आंसू&lt;br /&gt;अपनी आंखों में महसूसते हुए&lt;br /&gt;कि क्यों एक नारी को समूचा एशिया महाव्दिप&lt;br /&gt;निष्कासित करने के लिए उतारू है।&lt;br /&gt;मैं इसलिए कविता रचता हूं कि&lt;br /&gt;बगावत की मेरी आवाज़&lt;br /&gt;जड़हृदयों के भीतर तक चोट कर जाए&lt;br /&gt;और कहीं से तो&lt;br /&gt;एक चिंगारी उठे।&lt;br /&gt;मैं कविता रचता हूं&lt;br /&gt;क्योंकि आप भी समझ लें कि&lt;br /&gt;कविता रचने के बिना&lt;br /&gt;मैं रह नहीं सकता ।&lt;br /&gt;00-&lt;br /&gt;विनय दुबे जब खुश होते हैं&lt;br /&gt;नटराज बन जाते हैं&lt;br /&gt;और खेलने लगते हैं डांडिया&lt;br /&gt;विजय बहादुर सिंह के साथ ।&lt;br /&gt;विनय दुबे जब खुश होते हैं&lt;br /&gt;बड़ा तालाब भोपाल का&lt;br /&gt;लबालब भर जाता है&lt;br /&gt;और खबर बन जाती है&lt;br /&gt;एशिया का वह तीसरे नम्बर का&lt;br /&gt;नैसर्गिक तालाब है&lt;br /&gt;जो भर गया है विनय दुबे के हंसने से ।&lt;br /&gt;विनय दुबे जब खुश होते हैं&lt;br /&gt;भारत भवन कभी स्वराज भवन में&lt;br /&gt;सुनाने लगते हैं कविता&lt;br /&gt;भगवत रावत को&lt;br /&gt;सम्बोधित करते हुए&lt;br /&gt;यकीन न हो तो आप लोग&lt;br /&gt;हरि भटनागर&lt;br /&gt;सम्पादक साक्षात्कार&lt;br /&gt;संस्कृति भवन बाणगंगा&lt;br /&gt;भोपाल से&lt;br /&gt;पूछ सकते हैं।&lt;br /&gt;-.दो शब्दों के बीच, से&lt;br /&gt;रचनाकाल 21 जून 2004&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-1434872204552505460?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/1434872204552505460/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_4478.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1434872204552505460'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1434872204552505460'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_4478.html' title='कविता'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-7245574241294612472</id><published>2010-04-04T05:00:00.002-07:00</published><updated>2010-04-04T05:02:06.802-07:00</updated><title type='text'>कविता</title><content type='html'>आहूति &lt;br /&gt;मैं कर्म यज्ञ में निज की आहूति देता हूं.......&lt;br /&gt;मैं ही यजमान मैं ही यज्ञ का होता हूं........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पसन्द नहीं है उसको फूल पत्ती और गुलकन्द&lt;br /&gt;वह भूखा तड़पता होता और वे खा रहे होते कलाकन्द&lt;br /&gt;आंसू पोंछ कर गले स्नेह से लगाना पर्याप्त है&lt;br /&gt;हवन कर निज का दुःख दारिद्र मिटाना पर्याप्त है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समर्पित निज को कर स्वयं हवन बन लेता हूं&lt;br /&gt;मैं कर्म यज्ञ में निज की आहूति देता हूं.......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े बड़े महलों राजप्रसाद किसके लिए&lt;br /&gt;धन वैभव संपत्ति जायजाद किसके लिए&lt;br /&gt;छोड़कर हाथ खुले चल देना होगा एक दिन&lt;br /&gt;रह जाना होगा धरा का धरा यहां बिखरा हुआ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए मैं अपना सारा उपवन दे देता हूं&lt;br /&gt;मैं कर्म यज्ञ में निज की आहूति देता हूं.......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो जीवित है श्रद्धा नहीं उसके प्रति&lt;br /&gt;बाद मृत्यु श्राद्ध की क्या आवश्यकता&lt;br /&gt;भोग छप्पन चढ़ाये जाते बाद मरने के&lt;br /&gt;जीताजी रूला रूला कर लड़पाने की क्या आवश्यकता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्राद्ध नहीं मैं श्रद्धा को वरमाला पहना देता हूं&lt;br /&gt;मैं कर्म यज्ञ में निज की आहूति देता हूं......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-.कृष्णशंकर सोनाने&lt;br /&gt;जिस दिन से दुनिया &lt;br /&gt;जिस दिन से दुनिया&lt;br /&gt;इतनी बदल गई&lt;br /&gt;इतनी कि अब&lt;br /&gt;सब कुछ रंगहीन हो गया ।&lt;br /&gt;दुनिया अब&lt;br /&gt;इतनी बदल गयी है कि&lt;br /&gt;सारे मानवीय सरोकार&lt;br /&gt;हासिए पर डाल दिए गए है।&lt;br /&gt;रिश्तों की कमजोर&lt;br /&gt;हो गई है बुनियाद&lt;br /&gt;विश्वासों की मिनार&lt;br /&gt;ढग गई है&lt;br /&gt;इसीलिए तो गंगा&lt;br /&gt;अब मैली हो गई है।&lt;br /&gt;कानून अंधा और&lt;br /&gt;बौद्धिक विकलांगता से&lt;br /&gt;ग्रसित हो गए&lt;br /&gt;न्यायाधीश&lt;br /&gt;दिशाहीन पदचिन्हों का अनुसरणा&lt;br /&gt;किया जा रहा अंधाधुंध ।&lt;br /&gt;व्यवस्थाएं लचर&lt;br /&gt;असामाजिकता के&lt;br /&gt;पूर्वाग्रह से ग्रसित&lt;br /&gt;चिघाड़ चिंघाड़ कर&lt;br /&gt;साबित कर रही है&lt;br /&gt;अपने आपको आदर्श का दूत।&lt;br /&gt;उठाईगीर लम्पट और&lt;br /&gt;नम्बरदारों में&lt;br /&gt;बदल गई है व्यवस्थापिका&lt;br /&gt;चौर कर्म से अभिभूत&lt;br /&gt;तंत्राधिशों की सत्ता&lt;br /&gt;सावन भादों की&lt;br /&gt;फलफूल रही है।&lt;br /&gt;दुनिया अब इतनी&lt;br /&gt;बदल गई है कि&lt;br /&gt;संताप होता है&lt;br /&gt;यह सोच सोचकर&lt;br /&gt;अब क्या बच रह गया है दुनिया में ।&lt;br /&gt;बदलते ही दुनिया&lt;br /&gt;बदन गया मौसम&lt;br /&gt;ऋतु्ओं का सहसा परिवर्तन&lt;br /&gt;असहनीय हो गया है&lt;br /&gt;उठ खड़ा हुआ है मौसम&lt;br /&gt;इन्सानियत के खिलाफ ।&lt;br /&gt;घोटालें जीवन का&lt;br /&gt;बन चुके है पर्याय&lt;br /&gt;बन चुका है अब&lt;br /&gt;भ्रष्टाचार,शिष्टाचार ।&lt;br /&gt;दुनिया के बदल जाते ही&lt;br /&gt;भरभराकर गिर गई दीवार&lt;br /&gt;आचरण नम्रता और सभ्यता की।&lt;br /&gt;कहा करते थे जिस देश को&lt;br /&gt;सोने की चिड़िया&lt;br /&gt;दिखाई नहीं देती कहीं&lt;br /&gt;चहचहाते हुए अब ।&lt;br /&gt;दो लब्ज सुनने को आतुर&lt;br /&gt;तड़प रही है संवेदना&lt;br /&gt;प्रेम के&lt;br /&gt;जाने कहां की गई है कैद&lt;br /&gt;परिभाषा प्रेम की&lt;br /&gt;इसी एक उम्मीद के साथ&lt;br /&gt;अब तक जीवित है&lt;br /&gt;मनुष्यता की जिजीविषा।&lt;br /&gt;जब दुनिया&lt;br /&gt;बदल ही गई है तो&lt;br /&gt;उछल उछल कर&lt;br /&gt;पीटा जाना चाहिए ढिंढोरा&lt;br /&gt;बेहयायी नाइन्साफी नाउम्मीदी और&lt;br /&gt;नामुरादी का ।&lt;br /&gt;बदल गई है दुनिया,तब&lt;br /&gt;बदल जाने दीजिए&lt;br /&gt;हम तो जैसे थे पहले&lt;br /&gt;आज भी वैसे ही है&lt;br /&gt;अपना एक साल&lt;br /&gt;आगे किए हुए ।&lt;br /&gt;-.कृष्णशंकर सोनाने&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-7245574241294612472?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/7245574241294612472/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_9004.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/7245574241294612472'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/7245574241294612472'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_9004.html' title='कविता'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-5317270612806878358</id><published>2010-04-04T05:00:00.001-07:00</published><updated>2010-04-04T05:00:46.512-07:00</updated><title type='text'>कविता</title><content type='html'>राम का जैसे वनवास &lt;br /&gt;सारा जीवन मेरा राम का जैसे वनवास हो गया ।&lt;br /&gt;कुटिल खल कामियों के लिए जैसे परिहास हो गया..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा यह प्रयत्न रहा सबको प्रसन्न करूं मैं&lt;br /&gt;हो छोटे चाहे बड़े सबको नमन करूं मैं&lt;br /&gt;खाली हाथ न जाने पाये कोई मेरे व्दारे से&lt;br /&gt;हो भूखा चाहे प्यासा सबको तर्पण करूं मैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबकी आवभगत करने का मुझको जैसे अभ्यास हो गया&lt;br /&gt;मैं नत मस्तक होकर इनका उनका सबका दास हो गया..ण-----&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने जिस जिसको भी चाहा हितैषी अपना माना&lt;br /&gt;जिस जिसने जैसा चाहा गाया वैसे ही गाना&lt;br /&gt;दिन को कहा रात, रात को दिन कह डाला&lt;br /&gt;हां मे हां, ना में ना, बता किया उजाला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानवता की खातिर मैं आज जैसे खल्लास हो गया&lt;br /&gt;मेरा सारा जीवन तप तप कर जैसे सन्यास हो गया.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जितना गरल पीता रहा उतना होते रहा परिष्कृत&lt;br /&gt;जिस जिसके भी निकट जाना चाहा होते रहा तिरस्कृत&lt;br /&gt;मेरे भलमनसाहत का हृदय रहा सदा ही टूटता&lt;br /&gt;मेरे अपनों ने किया है इस तरह मुझको बहिष्कृत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साथ साथ उठते बैठते अपनत्व का जैसे उपहास हो गया&lt;br /&gt;सारा जीवन मेरा अब तो जैसे खाली गिलास हो गया...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-5317270612806878358?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/5317270612806878358/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_1763.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/5317270612806878358'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/5317270612806878358'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_1763.html' title='कविता'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-8983685175396461388</id><published>2010-04-04T04:59:00.002-07:00</published><updated>2010-04-04T05:00:05.925-07:00</updated><title type='text'>कविता</title><content type='html'>कचरा बीननेवाली लड़की भागू &lt;br /&gt;वह टी टी नगर के कूढ़ों पर&lt;br /&gt;मैले कुचैले कपड़ों में&lt;br /&gt;कचरा बीनते फिरती है&lt;br /&gt;गँदली-मैली सी सुन्दर लड़की&lt;br /&gt;मन ही मन गुनगुनाया करती है&lt;br /&gt;कोई रंगीला पे्रम गीत&lt;br /&gt;लरजते हैं उसके अधर&lt;br /&gt;किसी लजीली बात पर&lt;br /&gt;साफ करते हुए कचरा&lt;br /&gt;थिरकने लगते है उसके पैर&lt;br /&gt;मन ही मन मुस्कराती है&lt;br /&gt;उज्ज्वल भविष्य का सपना लिए&lt;br /&gt;मिल ही जाती है&lt;br /&gt;कोई न कोई वस्तु पुराने कपड़ों मे&lt;br /&gt;लिपिस्टिक, नैलपॉलिश या आईब्रो&lt;br /&gt;उड़ने लगते है उसके रेतीले ख्वाब कबूतरों की तरह&lt;br /&gt;प्रयास करती है वह&lt;br /&gt;दूर आकाश में उड़ने का&lt;br /&gt;निहारा करती है वह घरों में&lt;br /&gt;झाँक झाँक कर कौतुहल से&lt;br /&gt;टी व्ही सोफा कूलर रंग बी रंग सजावटे&lt;br /&gt;झट से तोड़ लेती है वह&lt;br /&gt;किसी आँगन में खिला गुलाब&lt;br /&gt;जुड़े में खोंसने का करती है नायाब प्रयास ।&lt;br /&gt;आधी अध्ूरी लिपिस्टिक से&lt;br /&gt;रंग लेती है वह&lt;br /&gt;काले काले मटमैले रतनारे होंठ&lt;br /&gt;टूटे हुए शीशे में लगती है निहारने&lt;br /&gt;अपना रंग रुप&lt;br /&gt;और धीरे से लगा लेती है ठुमका ।&lt;br /&gt;मचलती है वह किसी बात पर&lt;br /&gt;देखती है इधर -उघर&lt;br /&gt;निहार ले उसे कोई&lt;br /&gt;वह भी तो सुन्दर लग रही है&lt;br /&gt;छेड़ जाता है जब कोई उसे&lt;br /&gt;बिखर जाता कचरा उसका&lt;br /&gt;उखड़ जाती होंठों की लाली&lt;br /&gt;उसकी गर्द से भर जाता है सारा शहर&lt;br /&gt;टूट जाता उसका सपना&lt;br /&gt;नहीं बन सकती वह&lt;br /&gt;ऐश्वर्या राय सी सुंदर । &lt;br /&gt;कचरा बीनते बीनते लड़की&lt;br /&gt;गुनगुनाती है मन ही मन&lt;br /&gt;कोई रंगीला पे्रम गीत&lt;br /&gt;किसी लजीली बात पर ।&lt;br /&gt;---शंकर सोनाने&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-8983685175396461388?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/8983685175396461388/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_1154.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/8983685175396461388'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/8983685175396461388'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_1154.html' title='कविता'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-1352577307819095083</id><published>2010-04-04T04:58:00.000-07:00</published><updated>2010-04-04T04:59:01.219-07:00</updated><title type='text'>दहेज़ कहानी</title><content type='html'>दहेज &lt;br /&gt;हालांकि रेल्वे स्टेशन के आसपास भिखारियों की कमी नहीं रहती।जैसे ही रेल्वे स्टेशन के करीब पहुँचते हैं,हमारा सामना तरह.तरह के भिखारियों से होता है।लूले लंगड़े अंधे कोढ़ी बच्चे औरत बूढ़े इत्यादि।रेल्वे स्टेशन के आहाते में ओव्हर ब्रिज पर भीख मांगनेवालों की कतारें दिख जाती है।मटमैले जैसे महिनों से नहीं नहाये हों।चीकट दुर्गन्धयुक्त फटे पुराने चीथड़े कपड़े।किसी की रोने की आवाज़,किसी के कराहने की आवाज़,कोई पुकार.पुकार कर भीख मांगता तो कोई बहुत ही कातर होकर गुहार लगता है।इन्ही भिखारियों के बीच में रेल्वे स्टेशन के ओव्हर ब्रिज पर बैठकर भीख मांगते हुए किशन को शायद चार दशक हो गये।ब्रिज पर भीख मांगने के लिए किशन दादा ने अपना एक निश्चत स्थान बना लिया था।जैसे ही रेल्वे प्लेट फार्म से होकर ऊपर बि्रज पर चढ़ते हैं बिल्कुल सामने ही किशन दादा दिखाई देते हैं।किशन दादा के स्थान पर कोई अन्य भिखारी अतिक्रमण करने की हिम्मत नहीं कर सकता था।अन्य भिखारी किशन दादा से बहुत दूर दूर ही बैठते।उस ब्रिज पर मात्र किशन दादा का ही वर्चस्व रहता था यदि कोई गलती से भी भीख मांगता नज़र आता तो किशन दादा उससे उस दिन की सारी भीख हथिया लेते।उसके भीख मांगने का तरीका भी अन्य भिखारियों की अपेक्षा अलग ही रहता था।अन्य भिखारी उनकी नकल नहीं कर पाते। दाहिना हाथ और बांया पैर वैसे तो बहुत स्वस्थ्य थे लेकिन जब वे भीख मांगने के अपने स्थान पर बैठते तो उन्हे देखकर कोई भी महसूस कर सकता कि वे दाहिने हाथ और बांये पैर से अपाहिज ही है। दाहिना हाथ ढीला कर इस तरह लटकाते कि लगता उनका हाथ वास्तव में पंगु ही है।भीख मांगने की इसी शैली के कारण वे पिछले तीन दशक से भी अधिक समय से इसी तरह से भीख मांग रहे हैं।चलते समय किशन दादा बांये पैर को घसीटकर चलते और हर किसी को दिखाई देता है जैसे वे वास्तव मे अनाहिज है।यह उनक हुनर था।पांच के पंजे को मैले कुचैले कपड़ों से लपेटकर रस्सी से बांध लिया करते।देखनेवाला दाता उन्हे दखकर भावनावश भीख दे ही देता।चलते वक्त उनके चलने की शैली ऐसी होती कि एक पैर घसीटा जा रहा है और एक हाथ निढाल हुआ जा रहा है।देखते ही तरस आ जता किसी को भी।किशन दादा में एक खासियत यह भी थी कि वे थोड़ी बहुत अंगे्रजी के शब्दों का भी उपयोग बोलचाल में कर लिय करते।उनके अन्य साथी के पूछने पर वे यह कह कर टाल देते कि उन्होने यह अंग्रेजी आने जाने वालों से सुनकर सीखी है किन्तु किशन दादा हरि से कोई बात नहीं छिपाते।हरि ओव्हर ब्रिज के नीचे पायदान के पास बैठकर भीखा मांगा करता और अभी किशनदादा से भीख मांगने के गुर सीख रहा है।हरि अक्सर किशनदादा को अपना गुरू मानता और वह किशनदादा के नक्शे कदम पर चलता।एक दिन यों ही हरि ने किशन दादा को छेड़ा।‘कहाँ तक पढ़े हो दादा’‘ ऐसी बात क्यों करता है रे हरि।क्या कोई भिखारी भी पढ़ा लिखा होता है।’‘ नहीं,बात यह तो नहीं है….फिर भी मन में सवाल उठ ही गया है कि दादा कितनी अच्छी अंग्रेजी बोल लेते हैं और हाँ…एक दिन तुम कोई अंग्रेजी अखबार ज़ोर ज़ोर से पढ़ रहे थे।’‘सो तूने कैसे जाना।’‘ जब तुम ज़ोर ज़ोर से पढ़ रहे थे तभी टीटी साहब तुम्हारे पास कुर्सी पर बैठे सुन रहे थे और सुन कर खुश हो रहे थे।दादा तुम्हे याद होगा कि टीटी साहब ज़ोरों से खांस थे और तुम पढ़ते हुए थम गए थे।’ ‘मुझे याद नहीं।’&lt;br /&gt;‘ और टी.टी. साहब ने तुम्हे…सोचकर….हाँ,एक का सिक्का भी बख्शीश में दिया था।’&lt;br /&gt;‘ असल में हरि,मैं नौकरी की तलाश में भटक रहा था।डिग्रियाँ ले लेकर कहाँ.कहाँ नहीं भटका,बता नहीं सकता।पर कहीं नौकरी नहीं मिली।एक दिन देखा एक भिखारी पेड़ के नीचे बैठ भीख के पैसे गिन रहा है।बहुत से रूपये थे उस भिखारी के पास,मैने पूछा तो बताने लगा,ये जो लोग नौकरी करते हैं,हम उनसे कहीं ज्यादा कमा लेते हैं।पढ़ाई के बाद नौकरी नहीं मिल पाती तब मजदूरी करनी होती है और मजदूरी में भी इतना नहीं मिल पाता कि घर का खर्च पूरा हो सकें।शहरों में तो भिखारियों के बड़े.बड़े संघ काम करते हैं और भिखारियों की यूनियन भी है।उस भिखारी ने मुझे भीख मांगकर रूपये कमाने का तरीका सिखा दिया।फिर क्या,तब से ही मैं यह धंधा बराबर करता आ रहा हूँ,लेकिन दुःख है,मैं अपने घर नहीं जा सकता और यही का होकर हर गया। लम्बी सांसs लेते हुए किशन दादा टकटकी लगाये आसमान की ओर देखाने लगे।शायद सोच रहे हो कि हमारे देश में इतनी बेरोजगारी है कि शिक्षित लोगों को भी भीख का धंधा dरना पड़ रहा है।किशन दादा ने लम्बा बीड़ी का कश लिया और आसमान में धुआं छोड़ने लगे ।चांदनी छिटक रही थी।किशन दादा की आंखों से दो बूंद आंसू लुढ़ पड़े। पारों को पढ़ाया लिखाया नहीं।क्या पता पढ़ने के बाद पारो के लिए उचित दूल्हा मिलता है या नहीं।इसकी चिन्ता किशन दादा को शुरू से ही थी।किशन दादा ने पारो का ब्याह अपनी ही जमात में करना उचित समझा और पारो के लिए वर तलाशने की जहमत उसे उठानी नहीं पड़ी। हरि,किशन दादा की आंखों में पहले से था ही।हरि,किशन दादा के साथ भीख मांगने की मदद करता था।हरि के मां.बाप नहीं थे जब से हरि ने होश संभाला है तब से किशन दादा ही हरि के सर्वस्व रहे हैं।इसलिए किशन दादा को हरि से अच्छा वर कोई दिखाई नहीं दिया।बेटी.जमाई दोनों हमेशा नज़रों के सामने रहेंगे।हरि,भीख मांगने के बाद रात को घर लौटते समय किशन दादा को सहारा देकर अंधेरे कोने तक ले आता और ज्यों ही अंधेरे में आ जाते थे,हरि पीछे रह जाता था और किशन दादा सरपट आगे निकल जाते थे।किशनदादा अपनी फुर्तीली चाल के कारण हरि से दस कदम आगे ही चलते थे।किशनदादा ने पारो की शादी की बात हरि से ही चलाई क्योंकि हरि का अपना कोई नहीं था जो वे किशन दादा ही थे। ‘हरि…पारों अब सयानी हो गई।सोचता हूँ पारो का ब्याह हो जाय तो कम से कम आराम से मर सकूँ।‘ ‘काका,काहे को परेशान होते हो।तुम आदेश तो दो,हरि पारों के लिए दूल्हा ढूँढ निलकालेगा।‘ ‘ सच हरि।‘ ‘ तो क्या मैं ठिठोली कर रहा हूँ।” ‘ तो बस…मेरी बात मान ले…” ‘ सो क्या काका… ‘ तू ही पारो से ब्याह कर ले।‘ ‘ मैं…और पारो से….क्या कह रहे हो काका।‘ हरि के चेहरे पर विस्मय के भाव तैर आये। ‘ कहीं तुम मेरा मजाक तो नहीं बना रहे हों।‘ ‘ नहीं रे हरि….बस, तू मान जा…..&lt;br /&gt;‘ ठीक है काका।यदि ऐसी ही बात है तो….लेकिन हाँ,एक बात कहूँ काका…ब्याह में तुम मुझे क्या दोगे।”&lt;br /&gt;‘तुझे क्या चाहिए।‘‘दे सकोगे।‘‘तू मांग कर के तो देख।‘‘तो मांग लूँ।‘‘हाँ..हाँ..झिझकता क्यों है।‘‘दहेज दे सकते हो तो मैं तैयार हो जाऊँगा।‘‘दहेज और मेरे पास।‘‘हाँ..बहुत दहेज नहीं बस थोड़ा सा ही देना होगा।‘‘क्या है मेरे पास,तू ही बता।‘‘मुझे दहेज में और कुछ भी नहीं चाहिए।दे सको तो रेल्वे की वह पुलिया दे दो जहाँ बैठकर तुम भीख मांगते हो।‘‘लेकिन….‘लेकिन वेकिन कुछ नहीं।यदि पारो का ब्याह करना है तो वह पुलिया तो देना ही होगा।‘आखिर किशन दादा को हाँ कहनी ही पड़ती।दूसरे दिन किशन दादा और हरि पुराने कपड़ों को साफ कर पहने और बाज़ार गये।सारा दिन बाजार घूमते रहे।कई दिन बाद दोनों बाजार गए थे पारो के ब्याह के लिए सामान खरीदने।पारो के लिए साड़ी ब्लाउस,सिन्दूर,कागज,पेटीकोट,पतलून और जूते हरि के लिए।पूजा का थोड़ा सा सामान और दो फूलों की माला…बस…। अगले दिन पारो का ब्याह हरि के साथ सारी जमान के सामने हो गया।सभी भिखारियों को किशन दादा ने अच्छे से अच्छा खाना खिलाया।खूब खाये पीये और नाचे गये।किशन दादा ने जमान के सामने ही कहा.. ”आज से मेरी बेटी पारो के ब्याह के मौके पर जमाई हरि को वह रेल्वे का पुलिया दहेज में दे रहा हूँ।यहाँ मैं तीस साल से भीख मांगने का धंधा करता रहा।अब मेरी जगह मेरा जमाई बैठेगा। दूसरे दिन से ही हरि दहेज से प्राप्त रेल्वे ब्रिज पर उसी स्थान पर जा बैठा जहाँ किशन दादा भीख मांगने के लिए बैठा करते थे।टी टी ने किशनदादा की जगह पर दूसरे भिखारी को बैठा देखकर पूछा.. ” तुम यहाँ कैसे बैठे हो,यहाँ तो… ”हाँ,हुजूर मेरे ससुर किशन दादा ने यह पुलिया मुझे शादी में दहेज में दिया है।आज से मैं ही यहाँ बैठकर भीख मांगा करूँगा।‘ टी टी ,हिर का प्रसन्नचित्त चेहरा देख मुस्कराता रह गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-1352577307819095083?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/1352577307819095083/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_6651.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1352577307819095083'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/1352577307819095083'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_6651.html' title='दहेज़ कहानी'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-447822007580044139</id><published>2010-04-04T04:57:00.000-07:00</published><updated>2010-04-04T04:58:15.780-07:00</updated><title type='text'>पगली</title><content type='html'>पगली &lt;br /&gt;पगली जा रही वह न जाने किधर को।&lt;br /&gt;थोडी नाजुक सी थोडी शरमिली सी&lt;br /&gt;लिबास उघडे से कमर चलकीली सी&lt;br /&gt;शरारत करती सी बिखेरती तबस्सुम सी&lt;br /&gt;गुनगुनाती सी नयन मटकाती सी&lt;br /&gt;चली जा रही वह न जाने किधर को।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पगली जा रही वह न जाने किधर को।&lt;br /&gt;चली जा रही वह न जाने किधर को।।&lt;br /&gt;ताजमहल सा हुस्न खूबसूरत उसका&lt;br /&gt;महताब सा दमकता मेहताबे-रूख उसका&lt;br /&gt;गदराया गदराया उसका वह बदन&lt;br /&gt;महकता हुआ जैसे कहते है सन्दल&lt;br /&gt;बलखाती हुई वह चलती है ऐसे&lt;br /&gt;बहारे-बसन्त की मचले हो जैसे&lt;br /&gt;हंसती है ऐसे जैसे झरनों सा झर झर&lt;br /&gt;मचलती है ऐसे जैसे हवाएं हो सरसर&lt;br /&gt;जा रही जैसे नदिया सागर से मिलनेा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पगली जा रही वह न जाने किधर को।&lt;br /&gt;चली जा रही वह न जाने किधर को।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बडी बदमिजाज पगली इक लडकी&lt;br /&gt;गजलों को गीतो सा गुनगुनाया है करती&lt;br /&gt;गुल चुनती है वह बागानों में हर रोज&lt;br /&gt;साथ कलियों के खिली जा रही है&lt;br /&gt;पेड-पौधों लताओं बहारों को लिए&lt;br /&gt;मिलन पिया से चली जा रही है&lt;br /&gt;हवाओं संग संग उड जाती है वह&lt;br /&gt;दूर गगन से लौट आती है वह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बडी खूबसूरत पगली इक लडकी&lt;br /&gt;गजलों को गीतों सा गुनगुनाया है करती।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बडी बदहवास पगली इक लडकी&lt;br /&gt;रोती है न वह कभी हंसती है&lt;br /&gt;राह में खडे-खडे वह हमेशा&lt;br /&gt;राह महबूब की वह तकती है&lt;br /&gt;सजाया करती वह रहगुजर पिया की&lt;br /&gt;कलियॉं गुलों को वह बिखराया करती&lt;br /&gt;धोती है ऑंसुओं से राह महबूब की&lt;br /&gt;रोते-रोते नग्में महबूब के गाया वह करती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बडी खूबसूरत पगली इक लडकी&lt;br /&gt;सजायाकरती वह रहगुजर पिया की।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खत ले आता कासिद कभी तो&lt;br /&gt;खते-महबूब सीने से लगाया करती&lt;br /&gt;रहगीत कहीं से आ रहा हो कभी तो&lt;br /&gt;संदेश महबूब को पहुँचाय वह करती&lt;br /&gt;चॉंद से हैं पूछती वह चॉंदनी है पूछती&lt;br /&gt;हवाओं परिन्दों और घटाओं से वह पूछती&lt;br /&gt;कोई तो संदेशा मेरे महबूब का बताओ&lt;br /&gt;या संदेशा मेरा लेकर कोई जाओ&lt;br /&gt;ये ऑंसू रो-रोकर पुकारा है करते&lt;br /&gt;पहाडों दरियाओं कहीं पता तो बताओ&lt;br /&gt;आ रहा कब मेरा महबूब परदेश से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बडी खूबसूरत पगली इक लडकी&lt;br /&gt;चली जा रही वह न जाने किधर को।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बडी खूबसूरत पगली इक लडकी&lt;br /&gt;सियातरे सजाती बहारें सजाती&lt;br /&gt;सजधन के सरे-राह बैठ वह जाती&lt;br /&gt;बागाें से कहती नजारों से कहती&lt;br /&gt;राहों से पूछती रहगिरों से पूछती&lt;br /&gt;आज आनेवाला मेरा जाने-महबूब है&lt;br /&gt;खुदा का वास्ता मैंने दिया उसे है&lt;br /&gt;अल्ला को खबर मौला को खबर है&lt;br /&gt;महबूब मेरा आनेवाला इधर है&lt;br /&gt;खुदारा कोई राह रोके न इधर की&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बडी खूबसूरत पगली इक लडकी&lt;br /&gt;सितारे सजाती बहारे सजाती।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंडोले में चॉंद के है वह झूलती&lt;br /&gt;संग महबूब के है वह डोलती&lt;br /&gt;चहचहाती है वह मुस्कराती है वह&lt;br /&gt;रंग बहारें के है वह लुटाती&lt;br /&gt;कूकती वह कोयल सी कभी है&lt;br /&gt;रक्स करती वह मयूरा सी कभी है&lt;br /&gt;पुकारा करती है वह नाम ले के महबूब का&lt;br /&gt;बहारों को सितारों को लुटाया है करती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बडी खूबसूरत पगली इक लडकी&lt;br /&gt;रक्स करती वह मयूरा सी कभी है ।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दौडती है वह धरती से गगन तक&lt;br /&gt;चीखती है वह सितारों से चमन तक&lt;br /&gt;मचलती है वह सारे जहां में मचलकर&lt;br /&gt;आसमां सिर पर उठाकर चलते चली वह&lt;br /&gt;बडी खूबसूरत पगली इक लडकी&lt;br /&gt;दौडती है वह धरती से गगन तक।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिखर-बिखर जाती है काली जुल्फें उसकी&lt;br /&gt;बिफर बिफर कर लोटती है जमीं पर यहॉं से वहॉं तक&lt;br /&gt;जाने कैसी है ये चाहत खुदारा&lt;br /&gt;ख्वाब हसीन जाने है कैसे टूटा&lt;br /&gt;सपना वो टूटा जहॉं सारा लुटा&lt;br /&gt;पिया से मिलन का सिलसिला जो टूटा&lt;br /&gt;पहाड उचे चढी कूद नीचे पडी वह&lt;br /&gt;हादासा यहॉं खतम होता नहीं है&lt;br /&gt;गली के जाने किसी मोड पर कभी तो&lt;br /&gt;कल फिर मिलेगी खडी पगली वह लडकी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बडी खूबसूरत पगली इक लडकी&lt;br /&gt;चली जा रही थी वह न जाने किधर को।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-447822007580044139?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/447822007580044139/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_8774.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/447822007580044139'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/447822007580044139'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_8774.html' title='पगली'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-3042518832858084964</id><published>2010-04-04T04:56:00.000-07:00</published><updated>2010-04-04T04:57:37.342-07:00</updated><title type='text'>हिन्दू खान भाई</title><content type='html'>हिन्दू खान भाई- &lt;br /&gt;उसे यह पता नहीं कि उसका यह नाम कैसे पड़ा । कोई कहता उसके पिता मुस्लिम थे और माँ हिन्दू तो कोई कहता उसकी माँ मुस्लिम थी और पिता हिन्दू । कोई कोई और कुछ कहता लेकिन जबसे उसने होश संभाला है तब से उसे यह आभास होने लगा है कि वह हिन्दू भी है और मुस्लिम भी है। उसे नहीं पता,वह कब से पाँचों वक्त की नमाज अदा करने लगा है और उसे यह भी नहीं पता कि वह कब से रोज़ सुबह उठकर घर के कोने में प्रतिस्थापित भगवान की प्रतिमा की आरती उतारता रहा है। वह हिन्दुओं के त्यौहारों पर ,चाहे वह गणेश पूजन हो,डोल ग्यारह हो,नवरात्रा में दुर्गा पूजन हो,रामनवमी हो या कृष्ण जन्माष्टमि हो,मनाता रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह चारों धाम की यात्रा भी कर आया है और हज़ भी कर आया है। वह एकादशी,नवरात्रा व्रत,सत्यनारायण व्रत,जन्माष्टमी व्रत भी रखता है तो रोजे भी रखता है। वह गीता रामायण पढ़ता है तो कुरान शरीफ भी पढ़ता है।उसे तो बस इतना पता है कि वह हिन्दुओं के सारे पूजा पाठ से लेकर मुस्लिमों की सारी इबादतें भी करता रहा है। मुस्लिमों के सारे त्यौहार मनाता है । मीठी ईद,बकर ईद,शब्बारात से लेकर पीरगाहों तक वह इबादत करने जाता है। वह मन्दिरों में दोंनों वक्त जाता है तो मस्जिदों में भी नमाज अदा करने जाता है। हाँ,लेकिन उसने लिबास में बदलाव न लाते हुए महात्मा गाँधी का अनुसरण करते हुए सादा लिबास पसन्द किया 1&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह अक्सर खादी की धोती और खादी का ही कुर्ता पहनता है। कभी जूता नहीं पहनता बल्कि खादी भण्डार जाकर अपने लिए सारा चप्पलें ले आता है। यही है उसका पहनावा । इसी पहनावे को लेकर मोहल्ले के लोग,दोस्त और साथ में उठने बैठनेवाले उसे हिन्दू खान भाई कहकर सम्बोधित करते है।मित्रों और परिचितों में वह दो तरह से जाना जाता है। हिन्दू उसे हिन्दू भाई से सम्बोधित करते तो मुस्लिम उसे खान भाई से सम्बोधित करते । कोई उससे पूछता है कि उसके माता पिता का नाम क्या है तो वह हंसकर बताता है कि उसकी माता का नाम भारत माता है और पिता का नाम हिमाला है। वह अपना मज़हब भारतीय बताता । वह कहता है जिस देश में हिन्दू मुस्लिम एकता और भाईचारे के साथ रहते है वहाँ हिन्दू और मुस्लिमों में कोई भेद ही नहीं है। यह भेदभाव हिन्दू मुस्लिमों में नहीं है लेकिन इस भेदभाव की खाई नेताओं ने अपने स्वार्थ को लेकर तैयार की है।&lt;br /&gt;हम भारतियों में फूट डालकर राज करने के लिए तैयार की है ताकि हम लोग आपस में लड़ते मरते रहें और ये नेता हम पर राज करते रहे । हमारा शोषण करते रहे ।करीब पच्चीस तीस बरस पहले वह काजी बाबा को एक मेले में मिला था । बाबा बताते हैं ,शहर में कोई मेला लगा था और वह उसी मेले में रोते बिलखते हुए मिला था।पहले तो पुलिस से सहायता ली कि इसके मां बाप का पता लगाकर इसे उनके सुपुर्द कर दें लेंकिन उसे मां बाप का पता नहीं चला । पुलिस उसे अनाथालय भेज रही थी किन्तु काजी बाबा के अनुरोध पर पुलिस ने उसे उन्हें दे दिया । काजी बाबा उसे अपने साथा ले आए । काजी बाबा इस आसमंजस्य में पड़ गए थे कि वह जाने किस मज़हब का है हिन्दू है या मुस्लिम है। उन्होंने इस पचड़े में पड़ने की बजाय उसे दोनों मजहबों की तालीम देने लेगे । उसे कुरानशरीफ से लेकर गीता रामायण तक की शिक्षा दी । इबादत नमाज रोजे से लेकर पूजा पाठ और व्रत उपवास करना भी सिखाया ।&lt;br /&gt;अब की बार ईद और दीपावली साथ साथ आई थी । शायद दीपावली के बाद ईद पड़ी थी । उसने दीपावली और ईद मनाने की तैयारी साथ साथ शुरू कर दी थी । महिने भर पहले से ही वह इस तैयारी में लग गया था । वह जितनी तवज्जो मुस्लिम मज़हब को देता उतनी ही हिन्दू मजहब को दे रहा था ।अभी दो दिन ही त्यौहारों के बाकी थे कि राजनीति के चलते मन्दिर मस्जिद विवाद के बहाने दोनों समुदाय में दंगे का महौल बन गया । दोनों एक दूसरे के रक्त के प्यासे हो गए &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस रोज़ वह घर में ही था । काजी बाबा मस्जिद गए हुए थे। बाहर शोरगुल सुनकर वह बाहर आ गया । देखता है,दरवाज़े की एक ओर दस बीस हिन्दू हथियार लिए खड़े है तो दरवाज़े की दूसरी ओर भी इतने ही मुस्लिम भी हथियार लिए खड़े है। वह समझ नहीं पाया कि इतने सारे लोग हथियार लिए उसके दरवाज़े के सामने इस तरह क्यों खड़े है। वह दोनों ओर देखते ही रह गया । हिन्दु्ओं ने हथियार उठाए और ऊँची आवाज़ में बोले-&lt;br /&gt;” मारो,मारो , बच न पाएं ।”&lt;br /&gt;दूसरी ओर से मुस्लिम भी ऊँची आवाज़ में बोले-&lt;br /&gt;” मारो,मारो , बच न पाएं ।”&lt;br /&gt;हिन्दुओं और मुस्लिमों ने हथियार उठा लिए ।अब तक वह स्थिति समझ चुका था । वह चीख पड़ा-&lt;br /&gt;” किसको मारोगे,मुझको,क्या मैं हिन्दू नहीं हूँ या क्या मैं मुस्लिम नहीं हूँ । बताओ मैं कौन हूँ।”&lt;br /&gt;उसका इस तरह चीखकर प्रश्न करना हिन्दुओं और मुस्लिमों को भारी पड़ रहा था । वे समझ नहीं पा रहे थे कि जिसे वे मारने के लिए यहाँ एकत्र हुए है,वह हिन्दू है या फिर मुस्लिम है। वह फिर चीख पड़ा-&lt;br /&gt;"तुम में जो हिन्दू है वह मुस्लिम समझ कर मुझे मारें और तुममें जो मुस्लिम है वे हिन्दू समझकर मुझे मारें। बताओ तुम किसको मारना चाहते हो । क्या तुम बता सकते हो कि मैं हिन्दू हूँ या मुस्लिम । मैं एक इन्सान हूँ क्या तुम लोग एक इन्सान को मारना चाहते हो,तो मारों,मैं यह खड़ा हूँ ।"&lt;br /&gt;हिन्दू और मुस्लिम समझ नहीं पा रहे थे कि वह उसे क्या समझ कर मारें। हिन्दू या मुस्लिम। उनके हथियार उठे के उठे ही रह गए ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-3042518832858084964?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/3042518832858084964/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_5598.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/3042518832858084964'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/3042518832858084964'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_5598.html' title='हिन्दू खान भाई'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-6410178579664029339</id><published>2010-04-04T04:55:00.000-07:00</published><updated>2010-04-04T04:56:48.660-07:00</updated><title type='text'>तलाश है ऐसे लेखक की</title><content type='html'>मुझे तलाश है ऐसे लेखक की जिसमें इन्सान हो &lt;br /&gt;आज़ादी के बाद हिन्दी साहित्य में आ रहे परिवर्तन में सबसे खास परिवर्तन खेमेबाजी है । शक्तिसम्पन्न और बौद्धिक संवर्ग ने अपने अपने अलग अलग खेमे बना लिए है । इन अलग अलग खेमों में बंटे लेखकों और कवियों की विचारधारा भी अलग अलग ही है । बौद्धिक और शक्तिसम्पन्न लेखकीय समुदाय ने अपने खेमे से पृथक किसी अन्य को लेखक मानने से ही इन्कार कर दिया है। उत्तर आधुनिक लेखक अब तक पूर्णतः आधुनिक नहीं हुए है किन्तु वे सारे के सारे उत्तर औधुनिक का अलाप,अलाप रहे हैं । रचनात्मकता में विचारधारा के सम्मोहन का तड़का लगाया जा रहा है । उत्तर आधुनिक के नाम पर काव्य और गद्य में भी अकाव्यात्मकता एवं अगद्यात्मकता का पुट लगाया जा रहा है । इस तरह की रचनाएं की जा रही है,जिसका सामान्य पाठक वर्ग से कोई सारोकार नहीं है । खेतों में काम करनेवाले,सड़क किनारे काम करनेवाले मजदूर,कारखानों में कार्यरत वर्कर्स अगद्यात्मक और अकाव्यात्मकता को आत्मसात करने में असमर्थ तो है ही साथ ही इस प्रकार की रचनाओं से न तो व्यक्ति को,न परिवार को, न समाज को और ना ही देश को लाभ पहुंचता है। हां,रचनाकार अवश्य ही खेमेबाजी में बाजी मारकर अनावश्यक तौर पर पुरस्कार सम्मान प्राप्त कर ले जाते है । इसका भी कारण है,उत्तर आधुनिक के नाम पर रचनाकार खेमों के ही सम्पादकों और आलोंचकों को खुश करने के लिए लिखते हैं । उत्तर आधुनिकता के नाम पर लिखा जानेवाला साहित्य न तो समाज के और न ही देश के हित में है । मैं यहां किसी की आलोचना या निन्दा नहीं कर रहा और ना ही अपने गाल बजा रहा हूं किन्तु वास्तविकता यही है कि एक शक्तिसम्पन्न वर्ग सामान्य पाठकों के सामने केवल बौद्धिक कचना परोसकर वाह वाही लुटने में संलग्न है ।&lt;br /&gt;भवानी प्रसाद ने लिखा है,रचना इस तरह से लिखी जानी चाहिए,जिस तरह से रचनाकार सरल होता है । रचनाकार कठिन होगा तो रचना भी कठिन होगी और उसका जनता,समाज या देश से प्रत्यक्षतः कोई सरोकार नहीं होगा । आज यही हो रहा है । यही कारण है कि समाज बौद्धिकता से उब कर सिनेमा की ओर जा रहा है । पुस्तकें नहीं बल्कि टीव्ही और सिनेमा का क्रेज बढ़ता जा रहा है ।......------------------.आज स्थिति दयनीय हो गई है। एक खेमे का रचनाकार दूसरे खेमे के रचनाकार को बरदाश्त नहीं करता । इतना ही नहीं प्रसिद्ध रचनाकारों का रवैया असामजिक हो गया है । माना जाता है कि लेखक.रचनाकार संवेदनशील होता है किन्तु यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि बौद्धिक लेखक संवेदनशील नहीं होता । इसे यों भी कहा जा सकता है कि एक अच्छा लेखक उतना अच्छा इन्सान नहीं होता,भले ही एक अच्छा इन्सान अच्छा लेखक न हो । एक अच्छा लेखक भले ही मिल जाए किन्तु वह एक अच्छा इन्सान हो,यह जरूरी नहीं है । एक कोई अवश्य ऐसा लेखक होगा किन्तु उसकी पहुंच उतनी अच्छी नहीं होगी जितनी उसे चाहिए । अच्छे लेखक के साथ अच्छा इन्सान होना बड़े सौभाग्य की बात है । आजकल के लेखक कवि रचनाकार इतने ज्यादा बौद्धिक हो गए है कि वे ज़मीन पर तो चलते ही नहीं है बल्कि वे आसमान में उड़ने लगते है । वे पत्रोत्तर देना अपनी तोहिन समझते हैं ।-------------.मैंने अब तक कई लेखको को पत्र लिखे हैं । उन्हें अपनी पुस्तकें भेजी है,दी है किन्तु दुःख की बात है कि उनमें से अब तक हरिवंशराय बच्चन,विष्णुप्रभाकर,कमलाप्रसाद,विजयबहादरसिंह आदि ने ही पत्रों का जवाब दिया बाकी किसी ने भी नहीं । यहां यह भी कहना उचित होगा कि भले ही उनकी सूची में मैं नहीं हूं । सूची में आने के लिए शायद उनकी शर्तें पूरी न कर पाया हूं । कई लेखक तो ऐसे है कि उनकी तारीफों में बड़े लेखकौं ने जाने कितने कशीदे रच डालें किन्तु उनमें लेखक तो है किन्तु उनमें इन्सान ही नहीं है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-6410178579664029339?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/6410178579664029339/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_1024.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/6410178579664029339'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/6410178579664029339'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_1024.html' title='तलाश है ऐसे लेखक की'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-4199728794261703706</id><published>2010-04-04T04:54:00.002-07:00</published><updated>2010-04-04T04:55:35.971-07:00</updated><title type='text'>भोपाल गैस त्रासदी</title><content type='html'>भोपाल गैस त्रासदी &lt;br /&gt;काली रात&lt;br /&gt;ये कैसा धुआं है&lt;br /&gt;जो निगल रहा है शहर&lt;br /&gt;ये कैसा धुआं है&lt;br /&gt;जिसकी पूंछ शहर के&lt;br /&gt;इस सिरे से उस सिरे तक लम्बी है&lt;br /&gt;ये कैसा धुआं है&lt;br /&gt;जिसका मुंह सिरसा की तरह&lt;br /&gt;इस सिरे से उस सिरे तक खुला है ।&lt;br /&gt;ये कैसा धुआं है&lt;br /&gt;निगल रहा है जो शहर&lt;br /&gt;सिर और पूंछ से लगातार&lt;br /&gt;शहर के बाशिन्दे&lt;br /&gt;समाये जा रहे हैं जहरीले धुंएं के मुंह में&lt;br /&gt;ये शहर धुएं में है या&lt;br /&gt;ये धुआं शहर में है&lt;br /&gt;शहर में धुआं है और धुएं में शहर है&lt;br /&gt;लेकिन यह वाकया कि&lt;br /&gt;धुंऐ ने सारे शहर को निगल डाला है&lt;br /&gt;और शहर निष्प्राण हो गया है&lt;br /&gt;इस जहरीले धुएं के मुख में ।&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;शव यात्रा&lt;br /&gt;इन हाथों ने उठाए है&lt;br /&gt;डेढ़ हज़ार सs ज्यादा शव&lt;br /&gt;और एक ही चिता पर&lt;br /&gt;डेढ हजार शवों को रखा ।&lt;br /&gt;शवों के उदरों से&lt;br /&gt;पास होती मिक गैस&lt;br /&gt;और पास ही मृत पड़ी&lt;br /&gt;सडांध से युक्त दस बारह भैसें&lt;br /&gt;वो रिसती हुई लार शवों की&lt;br /&gt;मेरे वस्त्रों को तर करती रही&lt;br /&gt;आज भी समाई है वह दुर्गंध&lt;br /&gt;शवों की मिक गैस की&lt;br /&gt;पूरा शमशान शवों से भरा हुआ&lt;br /&gt;बच्चे बूढे&lt;br /&gt;औरत लड़कियां&lt;br /&gt;कौन मुस्लिम कौन हिन्दू&lt;br /&gt;कौन सिक्ख कौन ईसाई&lt;br /&gt;इन हाथों ने उठाई है उनकी लाशें&lt;br /&gt;और सभी को एक ही चिता पर &lt;br /&gt;लिटा कर अंतिम संस्कार किया गया&lt;br /&gt;धड़कता रहा मेरा हृदय तेजी से&lt;br /&gt;सप्ताह दो सप्ताह&lt;br /&gt;शवों के चेहरे मंडराते रहे आखों में&lt;br /&gt;वह दुर्दिन अब भी याद है&lt;br /&gt;याद आते ही रो पड़ता है मन&lt;br /&gt;कहता है&lt;br /&gt;अजी हां मारे गए इन्सान..&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;नोट -.मैंने गैस त्रासदी के समय अपने हाथों से लगभग डेढ़ हज़ार से ज्यादा शव उठाएं है और उन्हे चिता पर लिटा कर अन्तिम संस्कार किए है । स्मशान का वह दृश्य आज भी मेरे दिमाग में जस का तस है ।&lt;br /&gt;कृष्णशंकर सोनाने&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-4199728794261703706?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/4199728794261703706/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_8787.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/4199728794261703706'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/4199728794261703706'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_8787.html' title='भोपाल गैस त्रासदी'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-2468248293493665276</id><published>2010-04-04T04:54:00.001-07:00</published><updated>2010-04-04T04:54:42.876-07:00</updated><title type='text'>कृष्ण जन्म</title><content type='html'>थी मध्य निशा की पुनित बेला,औ´&lt;br /&gt;आच्छादित मेघ श्रृंखला व्यापार&lt;br /&gt;रजनिकर मुख छिपा क्षितिज में&lt;br /&gt;घुप् तम पथ था पारावार ।-1&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिमिर में भी ज्योति पूँज आलोड़ित होता&lt;br /&gt;घनन् घनन् घन घनन् घनन् घन मेखला&lt;br /&gt;पार व्योम से झांकता वह चितवन चकोरा&lt;br /&gt;जाने किसका होगा वह चंचल चपल छोरा ।-2&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मलयानिल बयार मधुर घ्राँण रंध सुवासित&lt;br /&gt;कौन है वह जो करता हृदय को वििस्मत&lt;br /&gt;कौन है वह जो होता पुलकित बार बार &lt;br /&gt;कौन है वह जो प्रमुदित होना है चाहता&lt;br /&gt;कौन है वह जो होना चाहता सृजनहार ।-3&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में निपट कौन मौन अस्तित्व लिए&lt;br /&gt;विहंसता सह कुसुमित सा सुकुमार&lt;br /&gt;तड़-तड़ तोड़ लौह बन्ध मुक्त वह&lt;br /&gt;प्रगट हुआ एक शिशु बीच कारागार ।-4&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोमल लघु पावन चरण धरा धर&lt;br /&gt;विभु नयन सम्मुख हो महा-मनोहर&lt;br /&gt;विहंस पड़ी अधराधर मधु मुस्कान&lt;br /&gt;यही होगा इस युग का महान गान ।-5&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई कल्पनातीत निशा मध्य कर उजियाला&lt;br /&gt;कर अलौकिक तन-रजनि में था उगनेवाला&lt;br /&gt;उस पराशक्ति का अनुभूतिजन्य था विकास&lt;br /&gt;कर रहा था तम का वह पल क्षण उपहास ।-6&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस काल खण्ड में लोक लीलामय जनमता&lt;br /&gt;भव धनु वितान उस भू पर विभु का तनता&lt;br /&gt;विधि विधान विविधमय वह कर जाता&lt;br /&gt;वह धरा पर उसी क्षण अवतरित हो जाता ।-7&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस क्षण सांसारिक माया स्वपन टूटता&lt;br /&gt;महाकण्ठ से बरबस युगल गान गूँज उठता&lt;br /&gt;दिग-दिगन्त तक प्रतिध्वनित हो उठती तान&lt;br /&gt;सकल जगत उल्लासित गा उठता वह गान ।-8&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस क्षितिज से वह मन्द मन्द मुसकाया&lt;br /&gt;विधि ने रच दी अपनी अद्भूत माया&lt;br /&gt;साधुजनों का करने को वह परित्राण&lt;br /&gt;संकल्परत धर्मध्वजा का होगा अभ्युथान ।-9&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अवतरण तब उसका जब नाद ब्रºम गुँजाया&lt;br /&gt;हो गई विमोहित वीणा-वादिनी की माया&lt;br /&gt;झंकार उठी दिशा-दसों औ´अखिल ब्रºमाण्ड&lt;br /&gt;विविध कण्ठ ने आवाहन उसका गाया ।-10&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अखिल विश्व प्रमुदित उल्लासित हो झूमा&lt;br /&gt;किंकर-गन्धर्व-अप्सराएं मृदंग झाँझ नृत्य होमा&lt;br /&gt;समूह गान स्तुति लय ताल छन्द युगल हो गाए&lt;br /&gt;व्योम अवनि अम्बर तल अनन्त धरा भी घुमा ।-11&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खग-मृग-व्याघ्र जीव-जन्तु मानव हृदय हषाZये&lt;br /&gt;लता कुँज वन नद नाल सरोवर अलसाये&lt;br /&gt;नहीं रूकता निरन्तर अल्हादित होता उल्लास&lt;br /&gt;उसके अधरों पर जगमग जगमग होता उजास ।-12&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पराजित होना उसने कभी सीखा नहीं&lt;br /&gt;हारने पर भी सदा गुदगुदाता था रहता&lt;br /&gt;कभी चरण रज प्रक्षालन में पीछे हटा नहीं&lt;br /&gt;होकर अपमानित फिर भी वह था मुस्काता ।-13&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निकुँज कुँजवन में लुकता छुपता उसका छलवाना&lt;br /&gt;चपल चंचल चतुर चितचोर का चितराना&lt;br /&gt;भला कौन नहीं चाहेगा ऐसे में भुजबन्ध मिलाना&lt;br /&gt;वृषभानुसुता को मधुर मुरली का सुनाना ।-14&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानवता की खारित उसने गान गीता का गाया&lt;br /&gt;जीवन सारा कर उत्सर्जित फिर भी वह मुस्काया&lt;br /&gt;मेरे कृष्ण तुम तो मेरे प्राणों के हो आधार&lt;br /&gt;आओ तो कर लूँ मैं तुमको जी भर के प्यार ।-15&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-2468248293493665276?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/2468248293493665276/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_9602.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/2468248293493665276'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/2468248293493665276'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_9602.html' title='कृष्ण जन्म'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-4813222789932830858</id><published>2010-04-04T04:53:00.000-07:00</published><updated>2010-04-04T04:54:05.361-07:00</updated><title type='text'>कविता</title><content type='html'>कचरा बीनने वाली लड़की : भागू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह टी टी नगर के कूढ़ों पर&lt;br /&gt;मैले कुचैले कपड़ों में&lt;br /&gt;कचरा बीनते फिरती है&lt;br /&gt;गँदली-मैली सी सुन्दर लड़की&lt;br /&gt;मन ही मन गुनगुनाया करती है&lt;br /&gt;कोई रंगीला पे्रम गीत&lt;br /&gt;लरजते हैं उसके अधर&lt;br /&gt;किसी लजीली बात पर&lt;br /&gt;साफ करते हुए कचरा&lt;br /&gt;थिरकने लगते है उसके पैर&lt;br /&gt;मन ही मन मुस्कराती है&lt;br /&gt;उज्ज्वल भविष्य का सपना लिए&lt;br /&gt;मिल ही जाती है&lt;br /&gt;कोई न कोई वस्तु पुराने कपड़ों मे&lt;br /&gt;लिपिस्टिक, नैलपॉलिश या आईब्रो&lt;br /&gt;उड़ने लगते है उसके रेतीले ख्वाब कबूतरों की तरह&lt;br /&gt;प्रयास करती है वह&lt;br /&gt;दूर आकाश में उड़ने का&lt;br /&gt;निहारा करती है वह घरों में&lt;br /&gt;झाँक झाँक कर कौतुहल से&lt;br /&gt;टी व्ही सोफा कूलर रंग बी रंग सजावटे&lt;br /&gt;झट से तोड़ लेती है वह&lt;br /&gt;किसी आँगन में खिला गुलाब&lt;br /&gt;जुड़े में खोंसने का करती है नायाब प्रयास ।&lt;br /&gt;आधी अध्ूरी लिपिस्टिक से&lt;br /&gt;रंग लेती है वह&lt;br /&gt;काले काले मटमैले रतनारे होंठ&lt;br /&gt;टूटे हुए शीशे में लगती है निहारने&lt;br /&gt;अपना रंग रुप&lt;br /&gt;और धीरे से लगा लेती है ठुमका ।&lt;br /&gt;मचलती है वह किसी बात पर&lt;br /&gt;देखती है इधर -उघर&lt;br /&gt;निहार ले उसे कोई&lt;br /&gt;वह भी तो सुन्दर लग रही है&lt;br /&gt;छेड़ जाता है जब कोई उसे&lt;br /&gt;बिखर जाता कचरा उसका&lt;br /&gt;उखड़ जाती होंठों की लाली&lt;br /&gt;उसकी गर्द से भर जाता है सारा शहर&lt;br /&gt;टूट जाता उसका सपना&lt;br /&gt;नहीं बन सकती वह &lt;br /&gt;ऐश्वर्या राय सी सुन्दर&lt;br /&gt;गुनगुनाती है मन ही मन&lt;br /&gt;कोई रंगीला पे्रम गीत&lt;br /&gt;किसी लजीली बात पर ।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;माँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाना पकाते हुए&lt;br /&gt;मैं अपनी माँ के बारे में&lt;br /&gt;सोचा करता हूँ ।&lt;br /&gt;तुमने कभी&lt;br /&gt;खाना पकाते हुए&lt;br /&gt;माँ के बारे में सोचा है !&lt;br /&gt;अच्छी बात है&lt;br /&gt;माताओं के बारे में सोचना&lt;br /&gt;अपनी अच्छाई उजागर होती है ।&lt;br /&gt;हम कुछ ऐसा हो सकते हैं&lt;br /&gt;पर सोचने में कठिनाई यह है कि&lt;br /&gt;हम ऐसा हो नहीं सकते&lt;br /&gt;होते तो माँ के अतिनिकट होते&lt;br /&gt;और माँ जैसे होते ।&lt;br /&gt;कितने करीब आना होता है माँ के&lt;br /&gt;माँ जैसा होने के लिए&lt;br /&gt;माँ दोनों समय खाना पकाती है&lt;br /&gt;क्या हम भी&lt;br /&gt;माँ के लिए खाना पका सकते हैं &lt;br /&gt;जब उसे हमारी आवश्यकता हो ।&lt;br /&gt;क्या हम भी &lt;br /&gt;माँ के बारे में सोचते हैं&lt;br /&gt;निकट या दूर से ।&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काकी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काकी बरसों से भूखी थी&lt;br /&gt;और पे्रमचन्द&lt;br /&gt;भोजन परोसना भूल गए थे&lt;br /&gt;भूख तो भूख होती है&lt;br /&gt;चाहे अच्छा खाना मिल जाए या साधारण&lt;br /&gt;भूखे को भोजना मिलना चाहिए ।&lt;br /&gt;जैसे ही सुगन्ध महकती है&lt;br /&gt;काकी की भूख बढ़ जाती है । &lt;br /&gt;दो इंच की ज़बान मचलती है&lt;br /&gt;पानी आ जाता मुख में&lt;br /&gt;चोरी से खाने का मन होता हे&lt;br /&gt;कभी कभी चोरी से&lt;br /&gt;खाने की घटना घटित हो जाती है&lt;br /&gt;वैसे चोरी से खाने का &lt;br /&gt;मज़ा ही कुछ और होता है&lt;br /&gt;ताकना झाँकना विवशता हो जाती है काकी की&lt;br /&gt;प्रतीक्षा करनी होती है&lt;br /&gt;कोई आकर परोस दे खाना ।&lt;br /&gt;सारे मेहमान उस दिन खाना खाकर चले गए&lt;br /&gt;काकी अपने कमरे में करती रही प्रतीक्षा&lt;br /&gt;बहू बेटे ने सुध ही नहीं ली काकी की&lt;br /&gt;मजबूरन झूठे पत्तलों को टटोल टटोलकर&lt;br /&gt;झूठन खाती रही।&lt;br /&gt;आज भी काकी भूखी है कई घरों में&lt;br /&gt;समय पर खाना मिल जाए तो कभी झूठे पत्तल&lt;br /&gt;टटोलना नहीं पड़ेंगे किसी काकी को।&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गेट आउट&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब चाहे तब&lt;br /&gt;गेट आउट किया जाता है मुझको&lt;br /&gt;जैसे गुस्से में निकाला जाता है&lt;br /&gt;नौकर को कमरे से ।&lt;br /&gt;बड़ी मिन्नत मनौती के बाद&lt;br /&gt;वे कहते है&lt;br /&gt;चलो ठीक है लेकिन&lt;br /&gt;अपनी औकात में रहा करों&lt;br /&gt;आइन्दा ऐसी गलती नहीं होनी चाहिए ।&lt;br /&gt;अँंगूठे से कुरेदते हुए ज़मीन&lt;br /&gt;दाँतों में दबाएं हुए आँचल&lt;br /&gt;हामी भरनी होती है&lt;br /&gt;तब कहीं जाकर वे भीतर बुला लेते है&lt;br /&gt;शरणार्थियो की तरह सशर्त ।&lt;br /&gt;मेरा कहीं भी वजूद नहीं रहता&lt;br /&gt;ज़रा सी चूँ चपट होने की देर है&lt;br /&gt;बिना किसी मुरव्वत के&lt;br /&gt;गेट आउट की जा सकती हूँ&lt;br /&gt;मेरे ही दम पर चलती है उनकी गृहस्थी&lt;br /&gt;सुबह का नाश्ता&lt;br /&gt;दोपहर का लंच&lt;br /&gt;और रात का खाना&lt;br /&gt;टाइम पर दूध और दवाइयाँ देना&lt;br /&gt;संभव नहीं है मेरे बग़ैर ।&lt;br /&gt;ये जो घर है&lt;br /&gt;महज़ खिड़की दरवाज़े फर्नीचर&lt;br /&gt;बर्तन भाण्डो से नहीं बनता&lt;br /&gt;इसे बनाया जाता है एक अदद औरत से&lt;br /&gt;अपनी सम्पूर्ण आत्मा &lt;br /&gt;ऊँढ़ेल कर&lt;br /&gt;गेट आउट उनका आखिरी दाँव है&lt;br /&gt;तीस दिनों के महिने भर में&lt;br /&gt;उन्तीस दिन गेंट आउट होना पड़ता है&lt;br /&gt;बहुत ही बेइज्जती के साथ&lt;br /&gt;फिर भी उनका मन नहीं मानता ।&lt;br /&gt;झेलना पड़ता है बार बार गेट आउट की जिल्लत&lt;br /&gt;बावजूद इतना सब होने के&lt;br /&gt;गेट इन होती हू&lt;br /&gt;उनको भी&lt;br /&gt;आने वाले समय में&lt;br /&gt;गेट आउट करने का संकल्प लिए ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-4813222789932830858?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/4813222789932830858/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_6780.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/4813222789932830858'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/4813222789932830858'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_6780.html' title='कविता'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-8435305380815998570</id><published>2010-04-04T04:52:00.000-07:00</published><updated>2010-04-04T04:53:22.689-07:00</updated><title type='text'>कविता</title><content type='html'>मैने ईज़ाद की कविता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डमरू के डम डम से&lt;br /&gt;बिखर गए शब्द&lt;br /&gt;ब्रह्माण्ड के अण्ड से फूट पड़े स्वर&lt;br /&gt;वीणा के नाद से गूंज उठा नाद&lt;br /&gt;शंकर के नृत्य से तरल हुए भाव&lt;br /&gt;भारती के नयनों से निकल पड़ा विभाव&lt;br /&gt;शिव की जटा से बह निकली सरिता&lt;br /&gt;एकत्र कर सार उपकरण&lt;br /&gt;मैने इजाद की कविता ।&lt;br /&gt;उषा के भाल पर&lt;br /&gt;छिड़क गया सिन्दूर&lt;br /&gt;सूरज की किरणों से&lt;br /&gt;बिखर गया नूर&lt;br /&gt;फूलों से टपक पड़ा&lt;br /&gt;कोमलता का भाव&lt;br /&gt;यौवन की चल पड़ी&lt;br /&gt;चंचल सी नाव&lt;br /&gt;मदमाती इतराती&lt;br /&gt;विहंस पड़ी गर्विता &lt;br /&gt;अम्बर के पास से&lt;br /&gt;मैंने ईजाद की कविता ।&lt;br /&gt;बरस पड़ा रस&lt;br /&gt;नवरंग नवरस में&lt;br /&gt;जीवन गया बस&lt;br /&gt;निर्धन की झोपड़ी में&lt;br /&gt;रिक्त पड़े कक्ष&lt;br /&gt;सीमा पर फौजी है&lt;br /&gt;कर्मठा में दक्ष&lt;br /&gt;ममता के आंचल से&lt;br /&gt;बहा नेह राग&lt;br /&gt;पी के अधरों पर&lt;br /&gt;पे्रममय पराग&lt;br /&gt;कली-कली,पुष्प-पुष्प&lt;br /&gt;भौरा है गाता&lt;br /&gt;सृष्टि के प्रांगण में&lt;br /&gt;मस्त हो जाता&lt;br /&gt;रचडाली शब्दों की&lt;br /&gt;सुन्दर सी सरिता&lt;br /&gt;अभिव्यंजना के रंगों से&lt;br /&gt;मैंने ईजाद की कविता ।&lt;br /&gt;000&lt;br /&gt;भेड़िये कभी छिपते नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;दुश्मन जब&lt;br /&gt;आपस में मिलना शुरू कर दे&lt;br /&gt;करें मित्रों की तरह व्यवहार&lt;br /&gt;लगे रिश्तों में अपनापन ।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;जब दुश्मन&lt;br /&gt;जागरूक हो जाए&lt;br /&gt;पेश आए सावधानी से&lt;br /&gt;मांगने लगे दुहाईयाँ&lt;br /&gt;लगे मिमियाने भेड़ों की तरह।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;जब दुश्मन&lt;br /&gt;उतारने लगे बलैया &lt;br /&gt;तारीफों के लगे बाँंधने पुल&lt;br /&gt;करने लगे मित्रों की बुराइयाँ।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;दुश्मन जब&lt;br /&gt;वर्जनाएं लगे तोड़ने&lt;br /&gt;पहनने लगे जामा सभ्यता का&lt;br /&gt;धतियाने लगे परम्परा&lt;br /&gt;लगे बिचकाने मुँह&lt;br /&gt;दिखाकर अपनापन ।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;जब दुश्मन&lt;br /&gt;चढ़ाने लगे मनौतियाँ&lt;br /&gt;पहनाने लगे माला फूलों की&lt;br /&gt;लगाने लगे मरहम घावों पर&lt;br /&gt;बगल में छिपाए हुए कटारी से&lt;br /&gt;छिलने लगे तलवें&lt;br /&gt;लगे खोजने अर्थ मलतब के ।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;दुश्मन जब&lt;br /&gt;मिलने लगे आपस में लगे&lt;br /&gt;साम्प्रदायिकों सी चलें चालें&lt;br /&gt;सभ्यतमा का दुशाला ओढ़े हुए ।&lt;br /&gt;आज हमारे बीच से ही&lt;br /&gt;कुछ दुश्मन कर रहें होंगे&lt;br /&gt;एक दूसरे के खिलाफ&lt;br /&gt;एक दूसरे के लिए&lt;br /&gt;धिनौना संघर्ष....&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;अपनत्व दिखाएं&lt;br /&gt;शेर की खाल में भेड़िए&lt;br /&gt;कभी छिपते नहीं ।&lt;br /&gt;08.07.2008 मंगलवार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-8435305380815998570?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/8435305380815998570/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_2888.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/8435305380815998570'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/8435305380815998570'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_2888.html' title='कविता'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-7111908869084979811</id><published>2010-04-04T04:51:00.000-07:00</published><updated>2010-04-04T04:52:42.035-07:00</updated><title type='text'>कविता</title><content type='html'>मैने ईज़ाद की कविता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डमरू के डम डम से&lt;br /&gt;बिखर गए शब्द&lt;br /&gt;ब्रह्माण्ड के अण्ड से फूट पड़े स्वर&lt;br /&gt;वीणा के नाद से गूंज उठा नाद&lt;br /&gt;शंकर के नृत्य से तरल हुए भाव&lt;br /&gt;भारती के नयनों से निकल पड़ा विभाव&lt;br /&gt;शिव की जटा से बह निकली सरिता&lt;br /&gt;एकत्र कर सार उपकरण&lt;br /&gt;मैने इजाद की कविता ।&lt;br /&gt;उषा के भाल पर&lt;br /&gt;छिड़क गया सिन्दूर&lt;br /&gt;सूरज की किरणों से&lt;br /&gt;बिखर गया नूर&lt;br /&gt;फूलों से टपक पड़ा&lt;br /&gt;कोमलता का भाव&lt;br /&gt;यौवन की चल पड़ी&lt;br /&gt;चंचल सी नाव&lt;br /&gt;मदमाती इतराती&lt;br /&gt;विहंस पड़ी गर्विता &lt;br /&gt;अम्बर के पास से&lt;br /&gt;मैंने ईजाद की कविता ।&lt;br /&gt;बरस पड़ा रस&lt;br /&gt;नवरंग नवरस में&lt;br /&gt;जीवन गया बस&lt;br /&gt;निर्धन की झोपड़ी में&lt;br /&gt;रिक्त पड़े कक्ष&lt;br /&gt;सीमा पर फौजी है&lt;br /&gt;कर्मठा में दक्ष&lt;br /&gt;ममता के आंचल से&lt;br /&gt;बहा नेह राग&lt;br /&gt;पी के अधरों पर&lt;br /&gt;पे्रममय पराग&lt;br /&gt;कली-कली,पुष्प-पुष्प&lt;br /&gt;भौरा है गाता&lt;br /&gt;सृष्टि के प्रांगण में&lt;br /&gt;मस्त हो जाता&lt;br /&gt;रचडाली शब्दों की&lt;br /&gt;सुन्दर सी सरिता&lt;br /&gt;अभिव्यंजना के रंगों से&lt;br /&gt;मैंने ईजाद की कविता ।&lt;br /&gt;000&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भेड़िये कभी छिपते नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;दुश्मन जब&lt;br /&gt;आपस में मिलना शुरू कर दे&lt;br /&gt;करें मित्रों की तरह व्यवहार&lt;br /&gt;लगे रिश्तों में अपनापन ।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;जब दुश्मन&lt;br /&gt;जागरूक हो जाए&lt;br /&gt;पेश आए सावधानी से&lt;br /&gt;मांगने लगे दुहाईयाँ&lt;br /&gt;लगे मिमियाने भेड़ों की तरह।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;जब दुश्मन&lt;br /&gt;उतारने लगे बलैया &lt;br /&gt;तारीफों के लगे बाँंधने पुल&lt;br /&gt;करने लगे मित्रों की बुराइयाँ।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;दुश्मन जब&lt;br /&gt;वर्जनाएं लगे तोड़ने&lt;br /&gt;पहनने लगे जामा सभ्यता का&lt;br /&gt;धतियाने लगे परम्परा&lt;br /&gt;लगे बिचकाने मुँह&lt;br /&gt;दिखाकर अपनापन ।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;जब दुश्मन&lt;br /&gt;चढ़ाने लगे मनौतियाँ&lt;br /&gt;पहनाने लगे माला फूलों की&lt;br /&gt;लगाने लगे मरहम घावों पर&lt;br /&gt;बगल में छिपाए हुए कटारी से&lt;br /&gt;छिलने लगे तलवें&lt;br /&gt;लगे खोजने अर्थ मलतब के ।&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;दुश्मन जब&lt;br /&gt;मिलने लगे आपस में लगे&lt;br /&gt;साम्प्रदायिकों सी चलें चालें&lt;br /&gt;सभ्यतमा का दुशाला ओढ़े हुए ।&lt;br /&gt;आज हमारे बीच से ही&lt;br /&gt;कुछ दुश्मन कर रहें होंगे&lt;br /&gt;एक दूसरे के खिलाफ&lt;br /&gt;एक दूसरे के लिए&lt;br /&gt;धिनौना संघर्ष....&lt;br /&gt;दोस्त बनकर&lt;br /&gt;अपनत्व दिखाएं&lt;br /&gt;शेर की खाल में भेड़िए&lt;br /&gt;कभी छिपते नहीं ।&lt;br /&gt;08.07.2008 मंगलवार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-7111908869084979811?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/7111908869084979811/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_04.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/7111908869084979811'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/7111908869084979811'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post_04.html' title='कविता'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-9034568613120497829.post-8653822963506894112</id><published>2010-04-04T04:47:00.001-07:00</published><updated>2010-04-04T04:51:34.064-07:00</updated><title type='text'>कविता</title><content type='html'>ताजमहल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताजमहल का ताजमहल होना&lt;br /&gt;सचमुच का ताजमहल होना है&lt;br /&gt;जैसे आगरे का ताजमहल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताजमहल यदि सच्चा ताजमहल है&lt;br /&gt;वह प्रेम का मिन्दर होगा&lt;br /&gt;जैसे मैं और उनका प्रेम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताजमहल कहते सुनते ही&lt;br /&gt;रोमांचित हो उठता है जिसका तनम न&lt;br /&gt;समझो हो गया है उसे कुछ कुछ&lt;br /&gt;एक और ताजमहल बनाने का रोग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग घरों में ताजमहल नहीं&lt;br /&gt;पे्रम भवन सजा रखते हैं&lt;br /&gt;यादें बनी रहे ताजा उम्रभर&lt;br /&gt;दिलाते हुए याद एक दूजे को।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तेरा शाहजहां ,मुमताजमहल तू मेरी&lt;br /&gt;गाते रहेंगे सुर ताल मिलाकर&lt;br /&gt;यमुना संभाले रखेगी जब तक&lt;br /&gt;पूरनमासी में जगर मगर करता ताजमहल ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्नत है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;हुस्न है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;इश्क है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;जिस्त है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;ख्वाब है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;यादें है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;तसव्वुर है तो कहीं और नहीं&lt;br /&gt;सिर्फ आगरे जाकर देखो यमुना किनारे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नत , हुस्न, इश्क , जिस्त ,ख्वाब&lt;br /&gt;यादे-तसव्वुर एक साथ दिखाई देंगे&lt;br /&gt;जगर मगर करते हुए दुधिया रातो में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ताजमहल का ताजमहल होना ही&lt;br /&gt;सचमुच का प्रेममहल होना है&lt;br /&gt;जैसे आगरे का ताजमहल&lt;br /&gt;जैसे मैं और उनका पे्रम ।&lt;br /&gt;0000......28/06/2007 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलावा इसके हो क्या सकता है कि&lt;br /&gt;अब तक न बनवा सका&lt;br /&gt;हृदय में उनके ज़रा सी जगह।&lt;br /&gt;उम्र के उस पड़ाव पर होना चाहिए था&lt;br /&gt;जिस पड़ाव पर वे खड़े है&lt;br /&gt;जिस बात पर वे अड़े हैं&lt;br /&gt;चुनने की अकांक्षा लिए हुए कोई फूल&lt;br /&gt;बासा और उजड़ा हुआ बागान&lt;br /&gt;क्या करेंगे सजाकर वे।&lt;br /&gt;कब का हो जाना चाहिए था निर्णय&lt;br /&gt;या कैद हो जाना चाहिए थी उम्र भर की&lt;br /&gt;या खुल्ला छोड़ दिया जाना चाहिए था&lt;br /&gt;बेलगाम भटकने के लिए।&lt;br /&gt;कम से कम बन ही जानी चाहिए थी अब तक जगह&lt;br /&gt;जिससे पुरसुकून हो सकें&lt;br /&gt;कि कैद कर लिया गया है उम्र भर&lt;br /&gt;कि खुल्ला छोड़ दिया गया हूं सांड की तरह ।&lt;br /&gt;फिर करना चाहता हूं निवेदन&lt;br /&gt;अब तो खुला छोड़ दो दरवाज़ा&lt;br /&gt;आ जा सकूं निस दिन चाहे जब&lt;br /&gt;बनवा सकूं एक छोटी सी जगह&lt;br /&gt;हृदय के उनके किसी कोने में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;00 01.07.2007...1:30 बजे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्म दिन का गणित&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ ने बताया&lt;br /&gt;जिस दिन तू पैदा हुआ&lt;br /&gt;उस दिन पूनम की सुबह थी&lt;br /&gt;सारा दिन रिमझिम रिमझिम पानी बरस रहा था&lt;br /&gt;गाय,भैंस और बकरियाँ&lt;br /&gt;चरने चली गई थी जंगल&lt;br /&gt;स्कूल की छुटि्टयाँ खत्म हो गई थी&lt;br /&gt;पड़ौसी की लड़की&lt;br /&gt;स्कूल जाने लग गई थी&lt;br /&gt;और हाँ ,जिस साल तू पैदा हुआ था&lt;br /&gt;उसी साल पं.जवाहरलाल नेहरू आये थे&lt;br /&gt;उद्घाटन करने कारखाने का&lt;br /&gt;लग गई थी तेरी नाक&lt;br /&gt;हाथों में उनके, और&lt;br /&gt;मुस्करा दिये थे पंडित नेहरू ।&lt;br /&gt;पूरे पचपनवे बरस के दिन&lt;br /&gt;जब ताजमहल को&lt;br /&gt;सातवे अजूबे में&lt;br /&gt;शामिल करने की मूहिम चल रही थी&lt;br /&gt;और निर्णय होना शेष रह गया था&lt;br /&gt;सप्ताह का सातवां दिन था&lt;br /&gt;महिने की सातवीं तारीख थी&lt;br /&gt;साल का सातवां महिना था&lt;br /&gt;सदी का सातवां वर्ष था&lt;br /&gt;यानी सभी सात सात सात।&lt;br /&gt;तब मैं अकेला एकान्त में बैठा&lt;br /&gt;लिख रहा हूँ जन्म दिन के गणित की कविता&lt;br /&gt;न केक न केण्डिल न मिठाई&lt;br /&gt;न ही कोई संगी-साथी&lt;br /&gt;और न ही कोई हेप्पी बर्थ डे टू यू ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/9034568613120497829-8653822963506894112?l=shankarsonane.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://shankarsonane.blogspot.com/feeds/8653822963506894112/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/8653822963506894112'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/9034568613120497829/posts/default/8653822963506894112'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://shankarsonane.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>कृष्णशंकर सोनाने</name><uri>http://www.blogger.com/profile/14761146352120054283</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_UF_vP9sJfY0/Sq4wx4_waTI/AAAAAAAAAJM/ZTI4MjDkMuc/S220/Picture.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
